Saturday, 22 March 2025

प्रकृति प्रेमी व सैलानियों को कुदरत का अनुपम उपहार

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देवदार, रोडोडेंड्रोन व ओक के घने जंगल के बीच रिज की उत्तरी ढलान पर स्थित है पौड़ी। ट्रेकर, पैराग्लाइडिंग के शौकीन, पर्यटक व प्रकृति प्रेमियों के लिए किसी सौगात से कम नहीं है यह पहाड़ी नगर।

दिनेश कुकरेती

पौड़ी देश ही नहीं, दुनिया का भी एकमात्र नगर है, जहां से आप हिमाच्छादित शिखरों की लगभग 200 मील लंबी शृंखला को सहजता से निहार सकते हैं। समुद्रतल से 5,500 से 8,000 फीट तक की ऊंचाई पर स्थित उत्तराखंड का पौड़ी नगर एक खूबसूरत हिल स्टेशन होने के साथ गढ़वाल जिला व गढ़वाल मंडल का मुख्यालय भी है। देवदार, रोडोडेंड्रोन व ओक के घने जंगल के बीच रिज (कंडोलिया पहाड़ी) की उत्तरी ढलान पर स्थित इस नगर से नंदा देवी, नीलकंठ, कैलास, स्वर्गारोहिणी, बंदरपूंछ, भागीरथी, गंगोत्री समूह, जोगिन समूह, जौली, यमुनोत्री, केदारनाथ, भृगुपंथ, खरचा, सुमेरु, सतोपंथ, कुमलिंग, हाथी पर्वत, नंदा घुंटी, चौखंभा, त्रिशूल आदि हिमशिखरों का मनमोहक नजारा देखते ही बनता है। ट्रेकर, पैराग्लाइडिंग के शौकीन और प्रकृति प्रेमियों के लिए भी पौड़ी कुदरत का अनुपम उपहार है। आप यहां आकर न केवल गगवाड़स्यूं घाटी व अलकनंदा घाटी (श्रीनगर गढ़वाल) की ट्रेकिंग, बल्कि एशिया के दूसरे सबसे ऊंचे रांसी स्टेडियम (महावीर चक्र विजेता शहीद राइफलमैन जसवंत सिंह स्टेडियम), चौखंभा व्यू प्वाइंट व सर्किट हाउस की सैर और कंडोलिया देवता मंदिर, नागदेव मंदिर व क्यूंकालेश्वर महादेव मंदिर में दर्शन भी कर सकते हैं। इस नगर का सर्वोच्च शिखर झंडीधार समुद्रतल से लगभग 8,000 फीट की ऊंचाई पर स्थित है।  

पौड़ी का औपनिवेशिक काल से रहा पर्यटन से जुड़ाव

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पौड़ी का पर्यटन से जुड़ाव औपनिवेशिक काल से रहा है। तब गर्मियों के दौरान अंग्रेज यहां आराम फरमाने के लिए आया करते थे। आजादी के बाद न केवल घरेलू आगंतुकों, बल्कि हिमालय की गोद में रहस्यमय अनुभवों की तलाश करने वाले अंतरराष्ट्रीय पर्यटकों के बीच भी यह नगर लोकप्रिय होता चला लगा। समय के साथ पौड़ी में ईको-टूरिज्म बढ़ने से होम स्टे और ईको-फ्रेंडली लाज भी अस्तित्व में आने लगे। पौड़ी नगर इतिहास, संस्कृति और प्रकृति को जोड़ता है। जैसे-जैसे पर्यटन का विकास हो रहा है, स्थिरता और क्षेत्र की प्राकृतिक सुंदरता को संरक्षित करने पर ध्यान केंद्रित करते हुए पौड़ी सभी तरह के पर्यटकों के लिए एक जरूरी स्थल के रूप में उभरकर सामने आया है। 

ब्रिटिश गढ़वाल का मुख्यालय रहा यह नगर

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इतिहास के पन्ने पलटें तो वर्ष 1804 में पूरे गढ़वाल पर गोरखाओं का नियंत्रण हो गया था। उन्होंने यहां 12 वर्ष तक राज किया। गोरखों के शासन का अंत वर्ष 1815 में तब हुआ, जब अंग्रेजों ने उन्हें पश्चिम में काली नदी तक धकेल दिया। गोरखा सेना की हार के बाद 21 अप्रैल 1815 को अंग्रेजों ने गढ़वाल राज्य का आधा हिस्सा, जो अलकनंदा और मंदाकिनी नदी के पूर्व में स्थित है, अपने नियंत्रण में ले लिया। इस हिस्से को ब्रिटिश गढ़वाल कहा गया। पश्चिम में गढ़वाल का शेष भाग, जो राजा सुदर्शन शाह के पास रहा, वह टिहरी रियासत कहलाया। शुरुआत में कुमाऊं व गढ़वाल आयुक्त का मुख्यालय नैनीताल में था, लेकिन बाद में गढ़वाल अलग हो गया। वर्ष 1840 में पौड़ी को गढ़वाल जिले का मुख्यालय बनाया गया और वर्ष 1969 में यह गढ़वाल मंडल का मुख्यालय भी है।


प्रमुख पर्यटन व तीर्थ स्थल

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रांसी स्टेडियम: देवदार और बांज के जंगल के बीच समुद्रतल से 7,000 फीट की ऊंचाई पर नगर के केंद्र से 2.5 किमी की दूरी पर स्थित है रांसी स्टेडियम। इसे एशिया के दूसरे सबसे ऊंचे स्टेडियम का दर्जा हासिल है। यहां से गगवाड़स्यूं घाटी की सुंदरता देखते ही बनती है।

कंडोलिया देवता मंदिर: ओक और पाइन के घने जंगल के बीच शांत वातावरण में 5,500 फीट से अधिक की ऊंचाई पर स्थित कंडोलिया देवता का मंदिर नगर के केंद्र से महज दो किमी के फासले पर है। यहां से आप पौड़ी नगर की खूबसूरती को निहार सकते हैं। मंदिर के निकट एक खूबसूरत पार्क और खेल परिसर भी है।

 नागदेव मंदिर: यह मंदिर पौड़ी-बुबाखाल रोड पर नगर के केंद्र से पांच किमी दूर देवदार और रोडोडेंड्रोन के घने जंगल के बीच स्थित है। मंदिर के रास्ते में एक वेधशाला स्थापित की गई है, जहां से आप चौखंभा, गंगोत्री समूह, बंदरपूंछ, केदरडोम, केदारनाथ पर्वत शिखर के रोमांचकारी दृश्य देख सकते हैं।

चौखंभा व्यू प्वाइंट: नगर के केंद्र से चार किमी की दूरी पर स्थित इस स्थल से मंत्रमुग्ध कर देने वाले ग्लेशियर देखे जा सकते हैं। रोडोडेंड्रोन और ओक के जंगल का घना आवरण इस जगह का मुख्य आकर्षण है।


कंकालेश्वर (क्यूंकालेश्वर) महादेव मंदिर: नगर के केंद्र से दो किमी दूर 6,000 फीट से अधिक की ऊंचाई पर स्थित भगवान शिव को समर्पित यह मंदिर आठवीं सदी का बताया जाता है। स्कंद पुराण के केदारखंड में उल्लेख है कि यह मंदिर कीनाश पर्वत पर अवस्थित है।

गगवाड़स्यूं घाटी: कंडोलिया की पहाड़ी से सटी गगवाड़ास्यूं घाटी करीब तीन वर्ग किमी क्षेत्रफल में फैली हुई है। यहां ग्राम पंचायत तमलाग व कुंजेठा में 12 वर्ष के अंतराल में होने वाला मौरी मेला घाटी को विशिष्टता प्रदान करता है। पांडवों से जुड़ा यह मेला छह माह (मार्गशीर्ष 22 गते से आषाढ़ 22 गते तक) चलता है, जो कि विश्व में किसी भी धार्मिक मेले की सबसे लंबी अवधि है। यह आयोजन इसी वर्ष दिसंबर से होना है। गगवाड़स्यूं घाटी की सैर आप पैदल या ट्रेकिंग करके भी कर सकते हैं। 


कब आएं: आप पौड़ी में बर्फ से लदी पहाड़ियां देखना चाहते हैं तो सर्दियों में आएं और हरियाली देखने के इच्छुक हैं तो गर्मियों का समय अच्छा रहेगा। वैसे मार्च से नवंबर तक पौड़ी में खुशनुमा मौसम रहता है, जबकि शीतकाल में जोरदार ठंड पड़ती है। खाने-ठहरने की यहां कोई दिक्कत नहीं है। छोटे-बड़े होटल, लाज व होम स्टे बजट के हिसाब से उपलब्ध हैं। आर्डर पर आप उत्तराखंड के पारंपरिक व्यंजनों का जायका भी ले सकते हैं।


ऐसे पहुंचें: जौलीग्रांट स्थित देहरादून एयरपोर्ट पौड़ी से 155 किमी की दूरी पर है। कोटद्वार निकटतम रेलवे स्टेशन है, जहां से पौड़ी की दूरी 105 किमी है। ऋषिकेश से भी सीधे पौड़ी पहुंचा जा सकता है।


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Nature's unique gift to nature lovers and tourists
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​​Pauri is situated on the northern slope of the ridge amidst the dense forests of deodar, rhododendron and oak. This hill town is no less than a gift for trekkers, paragliding enthusiasts, tourists and nature lovers.

Dinesh kukreti
Pauri is not only the only city in the country but also in the world from where you can easily see the 200 mile long chain of snow-clad peaks. Situated at an altitude of 5,500 to 8,000 feet above sea level, Pauri town of Uttarakhand is a beautiful hill station and is also the headquarters of Garhwal district and Garhwal division. Situated on the northern slope of the ridge (Kandoliya hill) amidst the dense forest of deodar, rhododendron and oak, from this town one can see the enchanting view of snow-clad peaks like Nanda Devi, Neelkanth, Kailash, Swargarohini, Bandarpoonch, Bhagirathi, Gangotri group, Jogin group, Jaoli, Yamunotri, Kedarnath, Bhrigupanth, Kharcha, Sumeru, Satapanth, Kumling, Hathi Parvat, Nanda Ghunti, Chaukhambha, Trishul etc. Pauri is also a unique gift of nature for trekkers, paragliding enthusiasts and nature lovers.  By coming here you can not only do trekking in Gagwarsyun Valley and Alaknanda Valley (Srinagar Garhwal) but also visit Asia's second highest Ransi Stadium (Maha Vir Chakra winner Shaheed Rifleman Jaswant Singh Stadium), Chaukhambha View Point and Circuit House and visit Kandoliya Devta Temple, Nagdev Temple and Kyunkaleshwar Mahadev Temple. The highest peak of this town Jhandidhar is situated at a height of almost 8,000 ft above sea level.


Pauri has been associated with tourism since the colonial period
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Pauri has been associated with tourism since the colonial period. Then during the summers, the British used to come here to relax. After independence, the town started becoming popular not only among domestic visitors but also among international tourists looking for mystical experiences in the lap of the Himalayas. With time, eco-tourism grew in Pauri and home stays and eco-friendly lodges also came into existence. The town of Pauri combines history, culture and nature. As tourism is growing, focusing on sustainability and preserving the natural beauty of the region, Pauri has emerged as a must-visit destination for all kinds of tourists.

This city was the headquarters of British Garhwal
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If we turn the pages of history, in the year 1804, the entire Garhwal was under the control of the Gorkhas. They ruled here for 12 years. The rule of the Gorkhas ended in the year 1815, when the British pushed them west to the Kali river. After the defeat of the Gorkha army, on 21 April 1815, the British took control of half of the Garhwal state, which is located to the east of the Alaknanda and Mandakini rivers. This part was called British Garhwal. The remaining part of Garhwal in the west, which remained with King Sudarshan Shah, was called the Tehri Riyasat. Initially, the headquarters of the Kumaon and Garhwal Commissioner was in Nainital, but later Garhwal was separated. In the year 1840, Pauri was made the headquarters of Garhwal district and in the year 1969 it is also the headquarters of Garhwal Division.

Mtouristajor  and pilgrimage sites
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Ransi Stadium: Ransi Stadium is located 2.5 km from the city center at an altitude of 7,000 feet above sea level amidst the deodar and oak forests. It has the status of Asia's second highest stadium. The beauty of the Gagwadasyun valley is worth seeing from here.

Kandolia Devta Temple: Situated at an altitude of more than 5,500 feet in a peaceful environment amidst dense forests of oak and pine, the temple of Kandolia Devta is just two km away from the city center. From here you can admire the beauty of Pauri city. There is also a beautiful park and sports complex near the temple.

Nagdev Temple: This temple is situated amidst dense forests of deodar and rhododendron, five km from the city center on Pauri-Bubakhal road. An observatory has been set up on the way to the temple, from where you can see thrilling views of Chaukhamba, Gangotri group, Bandarpoonch, Kedardom, Kedarnath mountain peaks.

Chaukhambha View Point: Located at a distance of four km from the city center, this place offers mesmerizing glacier views. The dense cover of rhododendron and oak forests is the main attraction of this place.


Kankaleshwar (Kyunkaleshwar) Mahadev Temple: Situated two km from the city center at an altitude of more than 6,000 feet, this temple dedicated to Lord Shiva is said to be of the eighth century. In the Kedarkhand of Skanda Purana, it is mentioned that this temple is situated on the Kinash mountain.

Gagwadasyun Valley: Gagwadasyun Valley adjacent to the Kandolia Hill is spread over an area of ​​about three square km. The Mauri Fair, held here in the Gram Panchayats Tamlag and Kunjetha after an interval of 12 years, gives uniqueness to the valley. This fair associated with the Pandavas lasts for six months (from Margashirsha 22nd to Aashadh 22nd), which is the longest duration of any religious fair in the world. This event is to be held from December this year. You can visit Gagwadasyun Valley by walking or trekking too.

When to visit: If you want to see snow-clad mountains in Pauri, then come in winters and if you want to see greenery, then summers will be a good time. Pauri has a pleasant weather from March to November, while it is extremely cold during winters. There is no problem of food and accommodation here. Small and big hotels, lodges and homestays are available according to the budget. You can also taste the traditional cuisine of Uttarakhand on order.

How to reach: Dehradun Airport located at Jolly Grant is 155 km away from Pauri. Kotdwar is the nearest railway station, from where Pauri is 105 km away. Pauri can also be reached directly from Rishikesh.


Sunday, 8 December 2024

08-12-2024 (ऐसी घाटी, जहां कभी बंद नहीं होते बदरी-केदार के कपाट)



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ऐसी घाटी, जहां कभी बंद नहीं होते बदरी-केदार के कपाट

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चमोली जिले की उर्गम घाटी में षष्ठम बदरी व पंचम केदार के रूप में होते हैं भगवान बदरी विशाल व बाबा केदार के दर्शन।नकल्प गंगा के तट पर महज दो-ढाई किमी के फासले पर स्थित हैं दोनों मंदिर, वर्षभर खुले रहते हैं इन दोनों धाम के कपाट।




दिनेश कुकरेती
शीतकाल के लिए कपाट बंद होने के बाद भी आप भगवान बदरी नारायण और बाबा केदार के दर्शन उनके मूल धाम में कर सकते हैं। लेकिन, प्रथम बदरी (बदरीनाथ) व प्रथम केदार (केदारनाथ) के रूप में नहीं, बल्कि षष्ठम बदरी व पंचम केदार के रूप में। वह भी एक ही जगह, महज दो-ढाई किमी के फासले पर। जी हां!चमोली जिले के जोशीमठ (ज्योतिर्मठ) की उर्गम घाटी में कल्प गंगा (हिरण्यवती) नदी के तट पर स्थित ध्यान बदरी और कल्पेश्वर धाम की ही बात हो रही है। अष्ट बदरी और पंच केदार समूह के इन मंदिरों में भगवान नारायण ध्यानावस्था और महादेव जटा रूप में दर्शन देते हैं। स्कंद पुराण के 'केदारखंड' में उल्लेख है कि इन दोनों ही धाम में दर्शन से बदरीनाथ व केदारनाथ धाम के दर्शन का पुण्य प्राप्त होता है। दोनों ही धाम के कपाट वर्षभर खुले रहते हैं।लेकिन, शीतकाल में यहां आने का आनंद ही कुछ और है। भीड़भाड़ न होने के कारण खाने-ठहरने की भी कोई दिक्कत नहीं होती। ...तो आइए! शीतकाल में एक ही स्थान पर भगवान बदरी-केदार के दर्शन करें।

ध्यान बदरी मंदिर
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चमोली जिले में समुद्रतल से 2,135 मीटर की ऊंचाई पर कल्पेश्वर धाम के पास स्थित इस मंदिर में शालिग्राम शिला से बनी भगवान नारायण की चतुर्भुज मूर्ति ध्यानावस्था में विराजमान है। भगवान नारायण हाथों में शंख व चक्र धारण किए हुए हैं। मंदिर में नर-नारायण, कुबेर और गरुड़ के विग्रह भी प्रतिष्ठित हैं। कहते हैं कि ध्यान बदरी मंदिर का निर्माण 12वीं सदी में आदि शंकराचार्य के मार्गदर्शन में हुआ। नक्काशीदार पत्थरों से कत्यूरी शैली बना यह मंदिर लगभग बदरीनाथ मंदिर के समान ही दिखता है। प्राचीन काल में जब प्राकृतिक चुनौतियों के कारण बदरीनाथ धाम की राह दुर्गम हो जाती थी, तब श्रद्धालु यहीं भगवान विष्णु की पूजा करते थे। ध्यान बदरी मंदिर की व्यवस्था डिमरी जाति के लोग संभालते हैं, जो बदरीनाथ धाम में श्रीलक्ष्मी मंदिर के मुख्य पुजारी भी हैं। कथा है कि जब देवराज इंद्र, महर्षि दुर्वासा के शाप से श्रीहीन हो गए तो उन्होंने भगवान विष्णु को प्रसन्न करने के लिए इसी स्थान पर कल्पवास किया। तब से यहां कल्पवास की परंपरा चली आ रही है। कल्पवास में साधक ध्यानलीन रहता है, इसलिए यहां पर भगवान का विग्रह भी आत्मलीन अवस्था में है। इस कारण विग्रह को ध्यान बदरी नाम से प्रतिष्ठित किया गया। ध्यान बदरी की कथा पांडव वंश के राजा पुरंजय के पुत्र उर्वर ऋषि से भी जुड़ी हुई है। कहते हैं कि उन्होंने उर्गम क्षेत्र में ध्यान किया था और यहां भगवान विष्णु का मंदिर बनवाया। मंदिर के गर्भगृह की दीवारें मानव मुखौटों से सजी हैं, जिनका इस्तेमाल मेलों (विशेषकर रम्माण मेला) के दौरान मुखौटा नृत्य में होता है।

कल्पेश्वर धाम
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समुद्रतल से 2,134 मीटर की ऊंचाई पर स्थित इस मंदिर में वृषभ रूपी महादेव के जटा दर्शन होते हैं, इसलिए उन्हें जटाधर या जटेश्वर भी कहा गया है। कथा है कि यहां ऋषि दुर्वासा ने कल्प वृक्ष के नीचे घोर तप किया था, जिससे यहbस्थान कल्पेश्वर या कल्पनाथ नाम से प्रसिद्ध हुआ। यह भी कथा है कि महाभारत युद्ध में संबंधियों की हत्या के दोष से मुक्ति के लिए पांडव जब महादेव के दर्शन को काशी से उनका पीछा करते हुए गुप्तकाशी पहुंचे तो महादेव वहां से भी ओझल हो गए। कुछ दूर जाकर उन्होंने बैल का रूप धारण किया और अन्य पशुओं के साथ जाकर मिल गए। इस रूप में भी पांडवों ने उन्हें पहचान गए और फिर भीम ने विशाल रूप धरकर दो पहाड़ों पर पैर फैला दिए, जिनके नीचे से अन्य पशु तो निकल गए, लेकिन वृषभ रूपी शिव आगे जाने को तैयार नही हुए। यह देख भीम बैल पर झपटे तो वह दलदली भूमि में समाने लगा। तब भीम ने बैल की पीठ को पकड़ लिया। पिंड रूप में मौजूद इसी हिस्से की केदारनाथ धाम में पूजा होती है। कहते हैं कि वृषभ के धड़ का ऊपरी भाग काठमांडू (नेपाल) में प्रकट हुआ और 'पशुपतिनाथ' कहलाया। भुजाएं तृतीय केदार 'तुंगनाथ', नाभि द्वितीय केदार 'मध्यमेश्वर', मुख चतुर्थ केदार 'रुद्रनाथ' और जटा पंचम 'कल्पेश्वर' धाम में प्रकट हुईं। यह पांच स्थल पंचकेदार के नाम से विख्यात हैं। कल्पेश्वर मंदिर के गर्भगृह का रास्ता एक गुफा से होकर जाता है। पहले हेलंग से उर्गम गांव होते हुए कल्पेश्वर की दूरी 12.7 किमी थी। अब हेलंग से देवग्राम तक जीप योग्य सड़क बन जाने के बाद कल्पेश्वर तक का पैदल ट्रेक महज 500 मीटर रह गया है।

यहां भी कर सकते हैं दर्शन और सैर
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उर्गम घाटी में प्रकृति के मनमोहक नजारे देखने को मिलते हैं। बर्फ से ढके ऊंचे-ऊंचे पहाड़, घने जंगल, घास के मैदान और झील-झरने इस घाटी की सुंदरता में चार चांद लगाते हैं। इसलिए इसे उत्तराखंड का छिपा हुआ खजाना भी बोला जाता है। प्रसिद्ध बंसी नारायण और फ्यूंला नारायण ट्रेक भी इसी घाटी से शुरू होते हैं। हालांकि, शीतकाल में इन दोनों मंदिरों के कपाट बंद रहते हैं। इस दौरान जोशीमठ-हेलंग के बीच अणिमठ नामक स्थान पर भगवान वृद्ध बदरी के दर्शन भी किए जा सकते हैं। वृद्ध बदरी धाम का अष्ट बदरी समूह में तीसरा स्थान है। इसके अलावा आप जोशीमठ स्थित नृसिंह मंदिर में भगवान बदरी विशाल के शीतकालीन दर्शन के साथ विश्व प्रसिद्ध स्कीइंग स्थल औली की सैर भी कर सकते हैं। जोशीमठ की दूरी हेलंग से 13.2 किमी है। जोशीमठ से 15 किमी आगे तपोवन के पास अर्द्ध बदरी धाम भी है।

ऐसे पहुंचें
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उर्गम घाटी पहुंचने के लिए बदरीनाथ हाईवे पर ऋषिकेश से हेलंग चट्टी तक 243 किमी की दूरी तय करनी पड़ती है। यहां कल्पेश्वर धाम जाने के लिए देवग्राम तक 12.7 किमी और ध्यान बदरी धाम जाने के लिए बड़गिंडा तक 10 किमी सड़क मार्ग है। उर्गम घाटी में खाने-ठहरने की पर्याप्त सुविधाएं हैं। होटल, लाज व होम स्टे पूरी घाटी में आसानी से उपलब्ध हो जाते हैं, जहां आप मनपसंद खाना बनवा सकते हैं। चाहें तो उत्तराखंडी खानपान का भी आनंद उठा सकते हैं।

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The doors of Badri-Kedar Dham are never closed in Urgam Valley
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Lord Badri Vishal and Baba Kedar can be seen in the form of Shasht Badri and Pancham Kedar in Urgam Valley of Chamoli district. Both the temples are situated at a distance of just two-two and a half km on the banks of Nakalp Ganga, the doors of both these Dhams remain open throughout the year.
Dinesh Kukreti
Even after the doors are closed for winter, you can see Lord Badri Narayan and Baba Kedar in their original Dham. But, not as Pratham Badri (Badrinath) and Pratham Kedar (Kedarnath), but as Shasht Badri and Pancham Kedar. That too at the same place, at a distance of just two-two and a half km.  Yes! We are talking about Dhyan Badri and Kalpeshwar Dham situated on the banks of Kalp Ganga (Hiranyawati) river in the Urgam valley of Joshimath (Jyotirmath) of Chamoli district. In these temples of Ashta Badri and Panch Kedar group, Lord Narayana appears in a meditative state and Mahadev appears in the form of Jata. It is mentioned in the 'Kedarkhand' of Skanda Purana that by visiting both these Dhams, one gets the virtue of visiting Badrinath and Kedarnath Dham. The doors of both the Dhams remain open throughout the year. But, the joy of coming here in winter is something else. Due to no crowd, there is no problem of food and accommodation. ...So come! Visit Lord Badri-Kedar at one place in winter.

Dhyan Badri Temple
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In Chamoli district, located near Kalpeshwar Dham at an altitude of 2,135 meters above sea level, this temple has a Chaturbhuj (four-armed) idol of Lord Narayana made of Shaligram stone sitting in a meditative state. Lord Narayana is holding a conch and a chakra in his hands. The idols of Nar-Narayan, Kubera and Garuda are also installed in the temple. It is said that Dhyan Badri temple was built in the 12th century under the guidance of Adi Shankaracharya. This temple made in Katyuri style with carved stones looks almost similar to Badrinath temple. In ancient times, when the road to Badrinath Dham became inaccessible due to natural challenges, devotees used to worship Lord Vishnu here. The management of Dhyan Badri temple is handled by people of Dimri caste, who are also the chief priests of Sri Lakshmi temple in Badrinath Dham.  The story is that when Devraj Indra became poor due to the curse of Maharishi Durvasa, he performed Kalpavas at this place to please Lord Vishnu. Since then the tradition of Kalpavas has been going on here. In Kalpavas, the devotee remains absorbed in meditation, so the idol of the Lord here is also absorbed in self. For this reason the idol was named Dhyan Badri. The story of Dhyan Badri is also associated with Urvar Rishi, son of King Puranjay of the Pandava dynasty. It is said that he meditated in the Urgam area and built a temple of Lord Vishnu here. The walls of the sanctum sanctorum of the temple are decorated with human masks, which are used in mask dances during fairs (especially Ramman Mela).


Kalpeshwar Dham
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Situated at a height of 2,134 meters above sea level, this temple has the darshan of Mahadev in the form of a bull, hence he is also called Jatadhar or Jateshwar. There is a story that Rishi Durvasa had performed severe penance under the Kalpa tree here, due to which this place became famous by the name of Kalpeshwar or Kalpnath. There is also a story that when the Pandavas followed Mahadev from Kashi to Guptakashi to get salvation from the sin of killing their relatives in the Mahabharata war, Mahadev disappeared from there as well. After going some distance, he took the form of a bull and joined the other animals. The Pandavas recognized him even in this form and then Bhima took a huge form and spread his legs on two mountains, under which other animals passed, but Shiva in the form of a bull was not ready to go further. Seeing this, Bhima pounced on the bull and it started sinking in the marshy land. Then Bhima caught hold of the bull's back.  This part present in the form of a body is worshipped in Kedarnath Dham. It is said that the upper part of the torso of Taurus appeared in Kathmandu (Nepal) and was called 'Pashupatinath'. The arms appeared in the third Kedar 'Tungnath', the navel in the second Kedar 'Madhyameshwar', the face in the fourth Kedar 'Rudranath' and the Jata in the fifth 'Kalpeshwar' Dham. These five places are famous as Panchkedar. The way to the sanctum sanctorum of Kalpeshwar temple goes through a cave. Earlier the distance from Helang to Kalpeshwar via Urgam village was 12.7 km. Now after the construction of a jeepable road from Helang to Devgram, the walking trek to Kalpeshwar is reduced to just 500 meters.
You can also visit and tour here
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The Urgam valley offers enchanting views of nature. The snow-clad high mountains, dense forests, grasslands and lakes and waterfalls add to the beauty of this valley. That is why it is also called the hidden treasure of Uttarakhand. The famous Bansi Narayan and Phyunla Narayan treks also start from this valley. However, the doors of both these temples remain closed during winter. During this time, one can also visit Lord Vridha Badri at a place called Animath between Joshimath and Helang. Vridha Badri Dham is the third in the Ashta Badri group. Apart from this, you can also visit the world famous skiing destination Auli along with the winter darshan of Lord Badri Vishal at the Narasimha temple in Joshimath. The distance of Joshimath from Helang is 13.2 km. There is also Ardha Badri Dham near Tapovan, 15 km ahead of Joshimath.  
How to reach
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To reach Urgam Valley, one has to cover a distance of 243 km from Rishikesh to Helang Chatti on the Badrinath Highway. There is a 12.7 km road to Devgram to reach Kalpeshwar Dham and a 10 km road to Badginda to reach Dhyan Badri Dham. There are ample food and accommodation facilities in Urgam Valley. Hotels, lodges and homestays are easily available in the entire valley, where you can get your favourite food cooked. If you want, you can also enjoy Uttarakhandi food.

Wednesday, 13 November 2024

13-11-2024 (सीढ़ियों पर बसा उत्‍तराखंड का एक खूबसूरत शहर)

सीढ़ियों पर बसे नई टिहरी शहर का भव्य नजारा। 

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सीढ़ियों पर बसा उत्‍तराखंड का एक खूबसूरत शहर

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भागीरथी व भिलंगना नदी के संगम पर बने टिहरी बांध के पास की पहाड़ी पर बसा है खूबसूरत नई टिहरी शहर। यहां आकर उठा सकते हैं आप रिवर-राफ्टिंग, ट्रेकिंग, राक क्लाइंबिंग जैसी रोमांचक गतिविधियों का भी आनंद।

सीढ़ियों पर बसे नई टिहरी शहर का भव्य नजारा। 


दिनेश कुकरेती
ई टिहरी। हिमालयी राज्‍य उत्‍तराखंड का एक ऐसा खूबसूरत पहाड़ी शहर, जिसे चंडीगढ़ की तरह मास्टर प्लान से बसाया गया गया है। यह उत्तराखंड का एकमात्र शहर है, जो 21वीं सदी में देश के नक्शे में जुड़ा। भागीरथी और भिलंगना नदी के संगम पर बने देश के सबसे ऊंचे टिहरी बांध के पास की पहाड़ी पर बसा यह शहर सचमुच अनूठा है। पंक्तिबद्ध मकान, सरकारी दफ्तर और व्यावसायिक भवनों के साथ यहां के पर्यटक स्थलों में भी अजीब-सा आकर्षण है। समुद्र की सतह से 1,550 से लेकर 1,950 मीटर तक की ऊंचाई पर मखमली-अनछुई हरियाली के बीच बसे इस शहर की घुमावदार साफ-सुथरी सड़कें, जगह-जगह बनाए गए सीढ़ीदार रास्ते, दूर-दूर तक फैली पहाड़ियां और ऊंचे-नीचे घने जंगल यहां आने वाले पर्यटकों को सम्मोहित-सा कर देते हैं।

टिहरी झील में साहसिक खेलों का प्रदर्शन। 


नई टिहरी शहर टिहरी जिले का मुख्यालय होने के साथ एक आधुनिक एवं सुव्यवस्थित नगर है, जो चंबा कस्बे से 11 किमी की दूरी पर स्थित है। यहां घरों के आसपास बनी इन सीढ़ियों पर से गुजरते हुए लोग स्वयं को पहाड़ की सभ्यता एवं संस्कृति के बेहद करीब पाते हैं। नई टिहरी में जलवायु सालभर खुशनुमा रहती है। यहां आकर आप भागीरथीपुरम, डोबरा-चांठी पुल, रानीचौरी, बादशाही थौल, चंबा, बूढ़ा केदार मंदिर, धनोल्टी, कैम्पटी फाल, देवप्रयाग जैसे कई पर्यटन एवं तीर्थ स्थलों की आसानी से सैर कर सकते हैं। टिहरी बांध और उसकी मानव निर्मित विशालकाय झील का नजारा तो यहां से देखते ही बनता है। शहर की सबसे ऊंची पहाड़ी पर बनाया गया पिकनिक स्थल तो धीरे-धीरे देश-विदेश के पर्यटकों की मनपसंद सैरगाह बनता जा रहा है। यहां से पर्यटकों को हिमाच्छादित पर्वत शृंखलाओं का अद्भुत नजारा देखने को मिलता है। इसलिए लोगों ने इस स्थान को ‘स्नो व्यू' नाम दिया है। शानदार प्राकृतिक स्थलों के साथ नई टिहरी एडवेंचर एक्टिविटी का भी प्रमुख केंद्र है। आप यहां आकर रिवर-राफ्टिंग, ट्रेकिंग, राक क्लाइंबिंग जैसी रोमांचक गतिविधियों का भी आनंद उठा सकते हैं।

झील की अतल गहराइयों में समाया ऐतिहासिक टिहरी शहर


झील के समाया है ऐतिहासिक टिहरी नगर

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टिहरी बांध की झील में डूब चुका मूल टिहरी नगर भागीरथी और भिलंगना नदी के तट पर स्थित था। पहले यह एक छोटा-सा गांव हुआ करता था, लेकिन वर्ष 1815 में गढ़वाल के राजा सुदर्शन शाह ने इस नगर को अपनी राजधानी बना दिया। इसी के नाम पर राज्य का नाम टिहरी गढ़वाल रियासत पड़ा। इस नगर का विस्तार तीन चौथाई मील लंबाई और आधा मील की चौड़ाई में हुआ था। 21वीं सदी की शुरुआत में भागीरथी व भिलंगना नदी के संगम पर टिहरी बांध का निर्माण होने के कारण पूरा टिहरी नगर जलमग्न हो गया। इसी के मद्देनजर सरकार ने तीन गांवों के साथ थोड़ी वन भूमि का अधिग्रहण कर बांध प्रभावितों के लिए नई टिहरी नगर की स्थापना की। वर्ष 2004 तक पुरानी टिहरी को पूरी तरह खाली कराकर यहां के निवासियों को नई टिहरी स्थानांतरित कर दिया गया।

बूढ़ा केदार मंदिर में देश का सबसे बड़ा स्वयंभू शिवलिंग। 



देश का सबसे बड़ा शिवलिंग

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मध्य हिमालय के ऐतिहासिक-पौराणिक मंदिरों की श्रेणी में एक है बूढ़ा केदार धाम। समुद्रतल से 4,400 फीट की ऊंचाई और नई टिहरी से 59 किमी की दूरी पर स्थित इस मंदिर का भी पंचकेदार शृंखला के मंदिरों सरीखा ही महत्व है। बूढ़ा केदार का उल्लेख स्कंद पुराण के केदारखंड में सोमेश्वर महादेव के रूप में हुआ है। मान्यता है कि गोत्र हत्या के पाप से मुक्ति को पांडव इसी रास्ते स्वर्गारोहणी की ओर गए थे। यहीं बालगंगा-धर्मगंगा के संगम पर भगवान शिव ने बूढ़े ब्राह्मण के रूप में पांडवों को दर्शन दिए और बूढ़ा केदारनाथ कहलाए। मंदिर के गर्भगृह में विशाल लिंगाकार फैलाव वाले पाषाण पर भगवान शिव की मूर्ति और लिंग विराजमान है। इतना बड़ा शिवलिंग शायद ही देश के किसी शिवालय में हो। बगल में ही भू-शक्ति, आकाश शक्ति और पाताल शक्ति के रूप में विशाल त्रिशूल विराजमान है। बूढ़ा केदार मंदिर के पुजारी नाथ जाति के राजपूत होते हैं। वह, जिनके कान छिदे हों।

बूढ़ा केदार मंदिर 



चंबा के क्या कहने

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नई टिहरी से 11 किमी दूर समुद्रतल से 1,676 मीटर की ऊंचाई पर स्थित हिल स्टेशन चंबा सेब व खुबानी के बाग और बुरांश के फूलों के लिए जाना जाता है। टिहरी बांध, सुरकंडा देवी मंदिर और ऋषिकेश की ओर बढ़ रहे पर्यटकों के लिए चंबा एक आदर्श ठहराव स्थल है। यहां गबर सिंह नेगी मेमोरियल व बागेश्वर महादेव मंदिर जैसे लोकप्रिय स्थल पर्यटकों को अपनी ओर खींचते हैं। चंबा बर्ड वाचिंग के शौकीनों के लिए भी आदर्श स्थल है। छुटियां बिताने के लिए चंबा उन आरामदायक स्थलों में से एक है, जहां आप असीम शांति की अनुभूति कर सकते हैं। यहां देवदार, बांज व बुरांश के वृक्षों की शीतल हवा पर्यटकों का मन मोह लेती है। चंबा की विशेषता यह है कि मसूरी और नई टिहरी जैसे हिल स्टेशनों के बहुत करीब होते हुए भी इस छोटे-से शांत कस्बे ने अपने ग्रामीण परिवेश को आज भी संजोकर रखा है।

टिहरी झील में बोटिंग का आकर्षक नजारा।



भागीरथीपुरम और टाप टेरेस

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टिहरी बांध की ओर से जाने वाले रास्ते में भागीरथीपुरम पड़ता है। इसी के पास टाप टेरेस नामक पर्यटन स्थल है। यहां से एक रास्ता बाबा विश्वनाथ की नगरी उत्तरकाशी की ओर चला जाता है। इन स्थानों पर आप पिकनिक मना सकते हैं, मंदिरों के दर्शन कर सकते हैं और टिहरी झील में होने वाले साहसिक खेलों का मजा भी ले सकते हैं।

सिद्धपीठ कुंजापुरी धाम।



सूर्योदय व सूर्यास्त का मनमोहक नजारा

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आप प्रकृति प्रेमी हैं तो कुंजापुरी चले आइए! पौराणिक सिद्धपीठ के रूप में विख्यात यह स्थल देवी-देवताओं से जुड़ी लोकोक्तियों के कारण ही नहीं, यहां से नजर आने वाले हिमालय के नयनाभिराम दृश्यों के लिए भी प्रसिद्ध है। ऋषिकेश-चंबा मार्ग पर हिंडोलाखाल नामक स्थान से हरे-भरे जंगलों के बीच पांच किमी का सफर तय कर यहां पहुंचा जा सकता है। यहां से हिमालय में सूर्योदय और सूर्यास्त का नजारा देखते ही बनता है।

विद्युत प्रकाश में जगमग डोबरा-चांठी पुल का मनमोहक नजारा। 



डोबरा-चांठी पुल

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टिहरी झील के ऊपर डोबरा-चांठी में बना देश का सबसे लंबा सस्पेंशन ब्रिज अब पर्यटकों का नया ठिकाना बन गया है। इस पुल पर आधुनिक तकनीकी से युक्त मल्टीकलर लाइटिंग की गई है, जिससे शाम ढलने के बाद इसकी आभा देखते ही बनती है। पुल की कुल 725 मीटर है, जिसमें 440 मीटर लंबा सस्पेंशन ब्रिज है।

टिहरी की प्रसिद्ध मिठाई सिंगोरी। 



सिंगोरी का कभी न भूलने वाला स्वाद

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आप टिहरी आए और यहां की प्रसिद्ध मिठाई सिंगोरी का स्वाद नहीं लिया तो समझिए असीम आनंद से चूक गए। शुद्ध खोया (मावा) से बनने वाली कलाकंद जैसी यह मिठाई मालू के पत्ते में पान की तरह लपेटकर परोसी जाती है। खोया के अलावा इसमें बारीक सफेद चीनी, नारियल व सूखे गुलाब के फूल के पाउडर मिलाया जाता है।

टिहरी झील में बने फ्लोटिंग हट्स।



खाने-ठहरने की उचित व्यवस्था

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नई टिहरी में खाने-ठहरने की कोई समस्या नहीं है। अच्छे होटल और गेस्ट हाउस यहां बने हुए हैं। गढ़वाल मंडल विकास निगम का विश्रामगृह भी ठहरने के लिए अच्छा स्थान है। नई टिहरी की देहरादून से दूरी 95 किमी और ऋषिकेश से 76 किमी है।

सीढ़ियों पर बसे नई टिहरी शहर का भव्य नजारा। 



कब आएं

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वैसे तो आप नई टिहरी कभी भी आ सकते हैं, लेकिन मार्च से जून और फिर अक्टूबर से दिसंबर तक का समय यहां घूमने के लिए सबसे अनुकूल है। जनवरी-फरवरी में यहां कड़ाके की ठंड पड़ती है, जबकि जून से सितंबर के बीच वर्षाकाल के चलते अक्सर मार्ग अवरुद्ध रहते हैं।

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A beautiful city of Uttarakhand situated on stairs
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The beautiful New Tehri town is built on a hill near the Tehri dam built at the confluence of Bhagirathi and Bhilangana rivers. You can come here and enjoy exciting activities like river-rafting, trekking, rock climbing.

Dinesh Kukreti
New Tehri. A beautiful hill town, which has been built with a master plan like Chandigarh. This is the only city of Uttarakhand, which got added to the map of the country in the 21st century. Situated on a hill near the country's highest Tehri Dam, built at the confluence of Bhagirathi and Bhilangana rivers, this city is truly unique. Along with row houses, government offices and commercial buildings, the tourist places here also have a strange charm. Situated amidst velvety-untouched greenery at an altitude of 1,550 to 1,950 meters above sea level, this city's winding clean roads, staircases built at various places, hills spread far and wide and dense forests up and down mesmerize the tourists coming here.

New Tehri city is the headquarters of Tehri district and is a modern and well-organized city, which is located at a distance of 11 km from Chamba town.  While passing through these stairs built around the houses, people find themselves very close to the civilization and culture of the mountains. The climate in New Tehri remains pleasant throughout the year. By coming here, you can easily visit many tourist and pilgrimage places like Bhagirathipuram, Dobara-Chanthi Bridge, Ranichauri, Badshahi Thaul, Chamba, Budha Kedar Temple, Dhanolti, Kempty Falls, Devprayag. The view of Tehri Dam and its huge man-made lake is worth seeing from here. The picnic spot built on the highest hill of the city is gradually becoming the favorite holiday destination of tourists from India and abroad. From here, tourists get to see the amazing view of the snow-clad mountain ranges. That is why people have named this place 'Snow View'. Along with wonderful natural places, New Tehri is also a major center of adventure activities. You can also enjoy exciting activities like river-rafting, trekking, rock climbing by coming here.

The historic Tehri town is submerged in the lake
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The original Tehri town, which has been submerged in the Tehri Dam lake, was located on the banks of Bhagirathi and Bhilangana rivers. Earlier it used to be a small village, but in the year 1815, King Sudarshan Shah of Garhwal made this town his capital. The state was named Tehri Garhwal Riyasat after this. This town was spread over a length of three-fourths of a mile and a width of half a mile. In the beginning of the 21st century, due to the construction of the Tehri Dam at the confluence of Bhagirathi and Bhilangana rivers, the entire Tehri town was submerged. In view of this, the government acquired three villages along with some forest land and established New Tehri town for the dam affected people. By the year 2004, the old Tehri was completely evacuated and the residents here were shifted to New Tehri.

The country's largest Shivling
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Budha Kedar Dham is one of the historical-mythological temples of the central Himalayas. Situated at an altitude of 4,400 feet above sea level and 59 km from New Tehri, this temple is as important as the temples of the Panch Kedar series. Budha Kedar is mentioned in the Kedarkhand of Skanda Purana as Someshwar Mahadev. It is believed that the Pandavas went to Swargarohini through this path to get salvation from the sin of Gotra Hatya. Here at the confluence of Balganga-Dharmganga, Lord Shiva appeared to the Pandavas in the form of an old Brahmin and came to be known as Budha Kedarnath. In the sanctum sanctorum of the temple, the idol and linga of Lord Shiva are seated on a huge linga-shaped stone. Such a big Shivling is hardly found in any Shiva temple in the country. Next to it, a huge trident is seated in the form of Bhu-Shakti, Akash Shakti and Patal Shakti. The priests of Budha Kedar temple are Rajputs of Nath caste.  Those whose ears are pierced.

What to say about Chamba
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Located 11 km from New Tehri at an altitude of 1,676 meters above sea level, hill station Chamba is known for apple and apricot orchards and rhododendron flowers. Chamba is an ideal stopover for tourists heading towards Tehri Dam, Surkanda Devi Temple and Rishikesh. Popular places like Gabar Singh Negi Memorial and Bageshwar Mahadev Temple attract tourists here. Chamba is also an ideal place for bird watching enthusiasts. Chamba is one of those comfortable places to spend holidays, where you can experience immense peace. The cool breeze of deodar, oak and rhododendron trees here captivates the tourists. The specialty of Chamba is that despite being very close to hill stations like Mussoorie and New Tehri, this small peaceful town has still preserved its rural environment.

Bhagirathipuram and Top Terrace
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Bhagirathipuram is situated on the way to Tehri Dam. Near this is a tourist spot called Top Terrace. From here, a road goes towards Baba Vishwanath's city Uttarkashi. At these places, you can have a picnic, visit temples and also enjoy adventure sports in Tehri Lake.


Enchanting view of sunrise and sunset
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If you are a nature lover, then come to Kunjapuri! This place, famous as a mythological Siddhapeeth, is famous not only for the folklore related to gods and goddesses, but also for the panoramic views of the Himalayas visible from here. One can reach here by traveling a distance of five km through lush green forests from a place called Hindolakhal on the Rishikesh-Chamba road.  From here, the view of sunrise and sunset in the Himalayas is worth seeing.



Dobara-Chanthi Bridge
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The country's longest suspension bridge built at Dobara-Chanthi over Tehri Lake has now become a new destination for tourists. This bridge has been fitted with multicolour lighting with modern technology, which makes its aura worth seeing after sunset. The total length of the bridge is 725 metres, of which 440 metres is a long suspension bridge.

The unforgettable taste of Singori
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If you come to Tehri and do not taste the famous sweet Singori, then understand that you have missed out on immense pleasure. This sweet like Kalakand made from pure Khoya (mawa) is served wrapped in a Malu leaf like a paan. Apart from Khoya, fine white sugar, coconut and dried rose flower powder are added to it.

Proper arrangement for food and accommodation
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There is no problem of food and accommodation in New Tehri. Good hotels and guest houses are built here. The rest house of Garhwal Mandal Development Corporation is also a good place to stay. New Tehri is 95 km from Dehradun and 76 km from Rishikesh.

When to come
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Although you can come to New Tehri anytime, but the time from March to June and then October to December is the most suitable time to visit here.  It is extremely cold here during January-February, while the roads are often blocked due to the rainy season between June and September.

प्रकृति प्रेमी व सैलानियों को कुदरत का अनुपम उपहार

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