Monday, 12 October 2026

12-10-2026 (किरायेदार)

किरायेदार 

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दिनेश कुकरेती

अब तक के जीवन में मैं ज्यादातर समय किरायेदार की भूमिका में ही रहा। पहले परिवार के साथ और बाद में अकेले। कितनी ही जगह। पहाड़ से लेकर मैदान तक।  सचमुच किरायेदार होना बडा़ कष्टदायी होता है और मेरे जैसे अंतर्मुखी इन्सान के लिए सुखदायी भी। फिलहाल मैं देहरादून में किरायेदार हूं, भरपूर 'गुडविल' वाला सज्जन और भरोसेमंद किरायेदार। मालिक मकान मेरे बारे में बहुत-सी बातें जानता है और बहुत-सी नहीं। शायद जान भी न पाएगा। जो बातें जानता है, वो मैंने ही बताई हैं और उन्हें बताने में कोई नुकसान भी नहीं। लेकिन, फिलवक्त मुझे दिल्ली की किरायेदारी रह-रहकर याद आ रही है।

बात वर्ष 1995 की है। कालेज कंपलीट हो चुका था यानी मैंने एमकॉम कर लिया था और अब कलयुग की तरह सिर पर सवार था पत्रकार बनने का भूत। हालांकि, पत्रकारिता की शुरुआत तो वर्ष 1990 में ही हो चुकी थी, लेकिन अब मैं इसमें स्थायी ठौर तलाश रहा था। बार-बार मन करता था कि दिल्ली चला जाऊं। दिसबंर के तीसरे हफ्ते की बात होगी। मेरा एक मित्र जो दिल्ली में रहता था, तब कोटद्वार आया हुआ था। मुलाकात हुई तो बातों-बातों में उसने मुझसे भी दिल्ली आने की गुजारिश की। वह रोहिणी सेक्टर-16 में किराये के जनता फ्लैट पर रहता था। कहने लगा, रहने की कोई दिक्कत नहीं और मेरा भी साथ हो जाएगा। फिर दो लोग साथ रहेंगे तो खर्चे का बोझ भी हल्का रहेगा। मुझे यह सुझाव पसंद आ गया और उससे 20 जनवरी को दिल्ली पहुंचने का वादा कर दिया।

... और मैंने कोटद्वार छोड़ दिया

अब मैं घर छोड़ने के लिए मन को मजबूत करने लगा था। फिर 20 तारीख भी आ गई। उस दिन सुबह दस बजे  उत्तर प्रदेश रोडवेज के सोहराबगेट डिपो की बस से मैं दिल्ली रवाना हो गया। सामान के नाम पर मेरे पास एक बडा़ सूटकेस और एक बैग था। कपड़े-लत्ते, बिस्तर-विस्तर सब इन्हीं में थे। शाम पांच बजे के आसपास मैं दिल्ली पहुंचा और  फिर उत्तमनगर जाने वाली बस (शायद 883 नंबर) में सवार हो गया। साढे़ छह बजे के आसपास मैं रोहिणी सेक्टर-16 पहुंच चुका था। अंधेरा घिर आया था और ठंडी हवाएं चल रही थीं। यह इलाका तब नया-नया बस रहा था, इसलिए यहां भीड़भाड़ भी नहीं थी। 

पास ही एक नाई की दुकान थी, जहां पर पूछताछ में पता चला कि मित्रवर की आज छुट्टी थी, सो शाम को कहीं निकल गए, संभवत: कुछ देर में लौट आएंगे। मेरे पास उसकी इंतजारी के सिवा कोई विकल्प नहीं था, इसलिए मैं नाई भाई के आग्रह पर दुकान में ही बैठ गया। कुछ ही देर में तीन युवक भी वहां पहुंच गए। उनसे नाई भाई ने मित्रवर के बारे में पूछा तो उनमें से एक बोला, "वो तो विलंब से आते हैं।" फिर मेरी ओर मुखातिब होते हुए बोले, "तब तक भाई साहब हमारे रूम में ठहर जाएंगे" और मेरा सूटकेस उठाकर जाने लगे। मैं भी बिना कुछ विचार किए उनके साथ हो लिया, यह जाने बगैर कि वो कौन हैं, कहां के हैं और क्या करते हैं। वैसे सच कहूं तो उस समय इससे बेहतर निर्णय लेने की क्षमता मुझमें थी भी नहीं। 

पराये भी अपने हो गए, मिट गईं शहरों के बीच की दूरियां

बहरहाल! अब मैं उनके रूम में था। उन्होंने स्टोव में दाल चढा़ई हुई थी। अब उनमें से एक तुरत-फुरत में राई की सब्जी काटने लगा तो एक आटा गूंथने में जुट गया। साथ ही बातचीत का सिलसिला भी चल पडा़। पता चला कि वे गाजियाबाद यूपी के रहने वाले हैं। तब उत्तराखंड नहीं बना था, सो कोटद्वार भी यूपी का हिस्सा हुआ। इस नाते हम सब एक ही प्रांत के रहने वाले ठैरे। अब कोटद्वार व गाजियाबाद के बीच की दूरियां मिट गईं और हम पडो़सी शहरों के हो गए। रिश्तों में भी अचानक आत्मीयता आ गई। मित्र का कहीं अता-पता नहीं था, लौटेगा भी या नहीं, कुछ भी कहना मुश्किल था। रात के नौ बज चुके थे। तीनों भाई भोजन करने की तैयारी कर रहे थे। सो, मुझसे भी बोले, "भाई साहब! वो न जाने कब आते हैं, इसलिए आप तो भोजन कर ही लो। हमें भी अच्छा लगेगा।"

उनकी बातों में कोई बनावट नहीं थी और रोटियां भी उन्होंने चार आदमियों के हिसाब से ही बनाई थीं। मैंने भी सुबह से कुछ नहीं खाया था और उस पर थकान से चूर हुआ जा रहा था। हालांकि, एक संस्कारी पहाडी़ की तरह मैंने उनकी बात का विनम्रता पूर्वक इनकार ही में जवाब दिया। लेकिन, वो भी अतिथि सत्कार में पारंगत ठेठ देहाती ठैरे। बोले, "भाई साहब! हम पराये हैं क्या, जो ना कर रहे हो। भोजन तो हम साथ ही करेंगे। और...उनको देर भी हो जाए तो चिंता वाली बात नी। चारों भाई यहीं बिस्तर डाल देंगे।" अब मैं खुद के भी वश में नहीं था, सो कोई जवाब दिए बिना चुपचाप थाली ली और भोजन करने लगा। यकीन जानिए, मुझे लग रहा था, जैसे न जाने कितने दिनों बाद खाना मिला है। राई की सब्जी तो...मेरे पास शब्द नहीं हैं उस स्वाद को बयां करने के लिए। अब मेरी चिंता काफी हद तक दूर हो गई थी। लग रहा था अपनों के बीच हूं। 

रात दस बजे हुई मित्र से मुलाकात

खैर! दस बजे के आसपास मित्र का पदार्पण हुआ। आते हुए नाई भाई से शायद उसे मेरे पहुंचने की सूचना मिल गई थी, सो वह सीधा भाई लोगों के ठिकाने पर आ पहुंचा। हालांकि, वह यह बात भूल चुका था कि मेरा उससे 20 जनवरी को दिल्ली पहुंचने का कमिटमेंट हुआ था। मुझे देखकर ही उसे यह बात याद आई। उस जमाने में मोबाइल-वोबाइल तो होते थे नहीं, जो आने से पहले मैं उसे इत्तिला करता। बहरहाल! रात चढी़ जा रही थी और भाई लोगों को भी सोने की जल्दी थी। सो, मुझसे मुखातिब हो विनम्रता से बोले, "भाई साहब! अब आप भी सो जाइए, सुबह मिलते हैं।"

अब मैं मित्रवर के रूम में था। उसने भोजन किया या नहीं, मुझे नहीं मालूम। क्योंकि मेरे पूछने पर उसने भोजन कर आने की बात कही थी। मुझे नींद आ रही थी, इसलिए इस मुद्दे का पटाक्षेप करने में ही बेहतरी समझी और जमीन पर बिस्तर डालकर नींद के आगोश में चला गया। सुबह नींद देर से खुली। रविवार का दिन था, इसलिए मित्रवर को भी शायद बेफ्रिकी थी। लेकिन, मैं बेफ्रिक नहीं था। मुझे काम की तलाश करनी थी। इसलिए नाश्ता करने के बाद मैंने मित्रवर को कुरेदना शुरू कर दिया। उसने आश्वस्त किया, "दो-चार दिन में काम बन जाएगा, बस! हमें अंग्रेजी के अखबार में मंगलवार और शनिवार को छपने वाले क्लासीफाइड पर नजर रखनी है।" 

दिल्ली में किरायेदार होने का तमगा मिला

अब मैं थोड़ा कम्फर्टेबल फील कर रहा था, सो विषय बदलते हुए लगे हाथ किराया और मालिक मकान के बारे भी पूछ लिया। मित्रवर ने जानकारी दी कि फ्लैट किसी हिमाचली का है, जो प्रकारांतर से उसकी भी रिश्तेदारी में है। लेकिन, उसके दिल्ली से बाहर रहने के कारण किराया बुआ लोग वसूलते हैं। किराया फिलहाल आठ सौ रुपये महीना है, इसलिए हम पर कोई खास बोझ नहीं पड़ने वाला। तीस साल पहले आठ सौ रुपये की रकम कोई छोटी-मोटी रकम नहीं थी, लेकिन मित्रवर के बोझ न पड़ने वाले इशारे से मैं समझ गया कि वह इसे "बडी़ रकम" क्यों मान रहा है। स्पष्ट था कि किरायेदारी में अब मेरी भी 400 रुपये की हिस्सेदारी हो चुकी थी। यानी अब मैं दिल्ली में किरायेदार होने का तमगा हासिल कर चुका था, जिसे बरकरार रखने के लिए जल्द से जल्द काम तलाशना था। 

अंग्रेजी अखबारों के सहारे शुरू हुई नौकरी की तलाश

अगली सुबह पहला काम मैंने यही किया कि अंग्रेजी अखबार इंडियन एक्सप्रेस खरीद लाया। मंगलवार का दिन होने के कारण अखबार क्लासीफाइड विज्ञापनों से लबालब था। दोनों ने ऊपर से नीचे तक नजर दौडा़नी शुरू कर दी। दो-तीन विज्ञापन मन मुताबिक मिले, सो दस्तावेजों की फाइल थामी और चल पड़े संबंधित पतों पर भाग्य आजमाने। मित्रवर के साथ होने से संबंधित कंपनियों के पते तलाशने को भटकना नहीं पडा़। पर, अफसोस! बात भी नहीं बनी। मित्रवर ने फिर हौसलाफजाई की, "टेंशन नहीं यार! इतनी बडी़ दिल्ली है, कल फिर देखते हैं।" मैंने भी सहमति में सिर हिलाया और कमरे की राह पकड़ ली। रास्तेभर वो मुझे दिल्ली का भूगोल समझाता रहा और मैं "हूं-हां" में जवाब देता रहा। रूम में पहुंचते-पहुंचते अंधेरा घिर आया था। खैर! हमने पास ही लगने वाले मंगल बाजार से सब्जी वगैरह खरीदी और पेट पूजा के अनुष्ठान में जुट गए। 

भोजन करने के बाद मित्रवर तो सीधे बिस्तर के हवाले हो गए, मगर मेरी आंखों में नींद नहीं थी। रह-रहकर मन में एक सवाल कौंध रहा था कि आखिर वह कौन सी नौकरी करता है, जिसमें दफ्तर जाने की बाध्यता न हो। और... अगर ऐसा नहीं है तो मित्रवर के दफ्तर न जाने की क्या वजह हो सकती है। कहीं ऐसा तो नहीं कि महाशय के पास कोई काम ही न हो। आशंका सच निकली तो मेरे भी पैर दिल्ली में जमने से पहले ही उखड़ सकते हैं। पर, उस वक्त सोए हुए व्यक्ति से तो कुछ पूछा नहीं जा सकता था। इसके लिए तो सुबह होने तक इंतजार करना मजबूरी था। 

सुबह नींद जल्दी ही टूट गई। बाहर देखा तो दिल्ली ने कोहरे की चादर ओढी़ हुई थी। हालांकि, मुझे कहीं जाना नहीं था, फिर भी मैं मन ही मन कोहरे के छंटने की कामना कर था। मित्रवर अभी भी निश्चंतता के खर्राटे ले रहे थे, लेकिन मैंने जगाने की चेष्टा नहीं की। खैर! जब महाशय की नींद टूटी, तब तक मौसम खुल चुका था। सो मैंने बिना मुहूर्त के ही सवाल दागा, "ड्यूटी जाना है क्या?" मित्रवर बोले, "पहले वाली कंपनी मनमाफिक नहीं थी, उसे छोड़ दिया। इन दिनों दोपहर बाद पार्ट टाइम काम कर रहा हूं। साथ ही फुलटाइम की भी खोज जारी है।"

सिर पर कर्जे का बोझ लिए हुए थे मित्रवर

मैंने बात आगे नहीं बढा़ई। कुछ देर की चुप्पी के बाद फिर मित्रवर बोले, "यार! थोडी़ देर में किराया दे आते हैं।" "पर, अभी तो महीना खत्म होने में हफ्ता बाकी है", मैंने कहा। इस पर मित्रवर बोले, "इस महीने नहीं दे पाया और पिछले महीने का भी बकाया है। कुछ पैसे तो होंगे ना?" इस सवाल का जवाब "ना" में दे पाना मेरे लिए संभव नहीं था। कारण, मुझे दिल्ली आए हुए अभी तीन दिन ही हुए थे। जाहिर था, खाली तो आया नहीं हूंगा। सो बोला, "कितने? पूरे ही दे देते हैं यार! बाकी देख लेंगे", मित्रवर का जवाब था। फिलहाल मेरे सामने कोई विकल्प नहीं था, लिहाजा सोलह सौ रुपये उसके हाथ में थमा दिए। 

भोजन कर हम पैदल ही किराया देने निकल पडे़। मधुवन चौक के पास ही एक सरकारी कालोनी में उसकी बुआ का परिवार रहता था। अजीब-सा माहौल था वहां का। किसी ने पानी तक के लिए नहीं पूछा। मुझे तो छोडि़ए, उसे भी नहीं। ऐसे माहौल में पलभर भी वहां ठहरना मेरे लिए असह्य होता जा रहा था। लिहाजा, मैंने उससे चलने का इशारा कर दिया। हालांकि, उसकी नातेदारी का मामला था, लेकिन आत्मसम्मान तो सबका होता है। सो, उसने भी किराया बुआ के हाथ में थमाया और हमने वहां से विदा ली। बस स्टाप के पास एक स्टाल से हमने अखबार खरीदा और पैदल ही घर की राह पकड़ ली। 

मिली एक साप्ताहिक अखबार में नौकरी

रूम में पहुंचते ही सबसे पहला काम हमने अखबार के पन्ने पलटने का किया और संयोग से रोजी का एक ठौर भी मिल गया। किसी कंपनी के एक साप्ताहिक अखबार का इश्तेहार छपा था। मुझे तो अखबार के सिवा कहीं काम करना ही नहीं था, इसलिए लगा जैसे मन की मुराद पूरी हो गई। अगली सुबह मैं मित्रवर के साथ बरफखाने के पास स्थित कंपनी के दफ्तर में इंटरव्यू के लिए मौजूद था। संपादक-कम-मालिक से मुलाकात हुई और 1,500 रुपये महीने में बात भी बन गई। उस दौर में भी यह बहुत अच्छी रकम तो नहीं थी, मगर दिल्ली में पैर जमाने का सहारा तो मिल ही गया था। इसलिए मन में संतुष्टि के भाव थे।अगली सुबह से नौकरी शुरू हो गई और दो-एक दिन में मित्रवर का भी एक कंपनी में जुगाड़ हो गया। अब हम सुबह चार बजे उठ जाते और ठीक आठ बजे रैट-पैट होकर बस स्टाप पर होते। 

धीरे-धीरे मुझमें भी आने लगी दिल्ली की चतुराई

मुझे दफ्तर तक तीन बस बदलनी पड़ती। पहली सेक्टर सोलह से मधुवन चौक, दूसरी मधुवन चौक से माल रोड-कैंप और तीसरी कैंप से बरफखाना। किराया सात रुपये बैठता। अब दिल्ली में रहते हुए धीरे-धीरे मुझमें भी चतुराई आने लगी थी। चूंकि, मेरा रूट माल रोड वाला था, जो दिल्ली यूनिवर्सिटी का भी रूट है, इसलिए खुद को स्टूडेंट शो कर मैं तीन के बजाय एक रुपये का ही टिकट लेने लगा। टिफिन मैं ले जाता था नहीं, इसलिए बेफिक्री रहती थी। शाम को लौटते हुए मुझे सीधे उत्तमनगर वाली बस मिल जाती, सो एक रुपये में मधुवन चौक पहुंच जाता। एक रुपया वहां से कमरे तक पहुंचने में खर्च होता था। लेकिन, डीटीसी की बस में सफर करने के दौरान थोडा़ सतर्क रहना पड़ता, क्योंकि कहीं पर भी टिकट चैकर आ धमकता था। 

झेलना पड़ा अर्थदंड, पूरा दिन भूखे गुजारा

एक दिन मेरा भी पाला टिकट चैकर से पड़ गया और मुझे पूरे बीस रुपये का अर्थदंड भुगतना पडा़। दरअसल, हमेशा की तरह उस दिन भी मैंने मधुवन चौक से एक रुपये का ही टिकट लिया था। लेकिन यह बस डीटीसी की थी, जिसे जहांगीरपुरी में टिकट चैकर ने रोक दिया। मैंने चालाक बनने की कोशिश यह कि टिकट चैकर के सामने ही बस से उतर गया, ताकि उसे लगे कि यहीं तक की सवारी है। लेकिन, दुर्भाग्य से वह मेरी स्थिति भांप गया। उसने मुझसे टिकट मांगा तो मैंने एक रुपये का टिकट उसके हाथ में थमा दिया। बस! फिर क्या था, बिना कुछ कहे उसने मेरा बीस रुपये का चालान काट दिया। उस दिन मेरी जेब में मात्र बीस रुपये ही थे, सोचिए उन्हें गंवाकर क्या हालत हुई होगी मेरी। 

मूड पूरी तरह उखड़ चुका था। मैंने आफिस जाने का प्लान कैंसिल कर दिया। रूम में लौटने से कोई फायदा नहीं था, क्योंकि चाभी मित्रवर के पास थी। सो, चालान को जेब में रखकर मैं मुद्रिका में सवार हो गया। इस चालान से उस दिन डीटीसी की बस में मैं कहीं घूमा जा सकता था। मैंने भी यही किया। पूरे दिन प्लस-माइनस मुद्रिका में  दिल्ली घूमता रहा। कुछ खाने-पीने का तो सवाल ही नहीं उठता था, क्योंकि जेब खाली थी। इसका फायदा यह जरूर हुआ कि दिल्ली के बारे में बहुत-कुछ जान-समझ गया। और... हां! इस चालान को अगले माह इसी तारीख पर मैंने फिर इस्तेमाल किया। क्योंकि महीना उसमें ठीक-ठीक पढ़ने में नहीं आ रहा था।

जयपाल दा से मुलाक़ात

धीरे-धीरे जिंदगी की गाडी़ खिसकने लगी। पत्र-पत्रिकाओं में स्वतंत्र लेखन से भी कुछ पैसे मिल जाते थे। संपर्क बढ़ने पर बडे़ समाचार पत्रों में दफ्तरों में भी आना-जाना हो गया। खासकर राष्ट्रीय सहारा, जनसत्ता, नवभारत टाइम्स व दिल्ली प्रेस के दफ्तर में। एक दिन मित्रवर ने बताया कि वह ऐसे सज्जन को जानता है, जो साहित्यकार टाइप के हैं और उनके संपर्क भी अच्छे हैं। इन सज्जन का नाम उसने जयपाल सिंह रावत बताया। साथ ही इतवार को उनसे मुलाकात कराने की बात भी कही। मुझे भी लगा कि मुलाकात करने में कोई बुराई नहीं है। मन में गोस्वामी तुलसीदास की एक चौपाई कौंधने लगी- "ना जाने किस वेश में नारायण मिल जाएं।" फिर क्या था, इतवार को हम उत्तरी पीतमपुरा स्थित उनके ठीये पर जा धमके। 

मैं ही हूं जयपाल दा का पहला गंभीर श्रोता 

पहली ही मुलाकात इस कदर आत्मीय रही कि जयपाल दा और उनके परिवार से मेरा मन का रिश्ता जुड़ गया। जयपाल दा ने गढ़वाली में लिखी अपनी कई कविताएं भी इस दौरान सुनाईं। संयोग देखिए कि उनकी कविताएं सुनने वाले पहले एवं गंभीर श्रोता होने का श्रेय भी मुझे ही जाता है। आज वे गढ़वाली के प्रतिष्ठित कवि हैं और देश के कई हिस्सों में कविता पढ़ने बुलाए जाते हैं। उन दिनों मैंने भी गढ़वाली में लिखना शुरू कर दिया था, इसलिए हमारी दोस्ती प्रगाढ़ होने के संकेत मिलने लगे। जयपाल दा ने गढ़कवि कन्हैया लाल डंडरियाल से मुलाकात कराने का भी भरोसा दिलाया। वे डंडरियाल जी को पिता तुल्य सम्मान देते थे। उस रात हम उनके यहां से भोजन करके ही रूम पर लौटे। 

गढ़कवि कन्हैया लाल डंडरियाल से मुलाकात

धीरे-धीरे मुझे दिल्ली रास आने लगी थी, लेकिन साथ में दिक्कतें भी बढ़नी शुरू हो गईं। तब हमारे जैसे प्रवासियों का चूल्हा केरोसिन से ही जला करता था, लेकिन हमारे पास अब दो-एक दिन के लिए ही केरोसिन बचा था। व्यवस्था ब्लैक में ही हो सकती थी, जो फिलहाल संभव नहीं थी। संयोग देखिए कि रात को न जाने किधर से जयपाल दा रूम में आ गए। मूड में भी थे। मैंने उनके सामने यह चिंता रखी तो बोले, "व्यवस्था हो जाएगी, टेंशन लेने की जरूरत नहीं।" अगले दिन वे दस लीटर केरोसिन लेकर हाजिर थे। मैंने पैसे का जिक्र छेडा़ तो उन्होंने मुझे चुप करा दिया। उस रात मैं उन्हीं के घर रहा। वहां डंडरियाल जी भी आए हुए थे, सो मुझे भी उनके दर्शनों का सौभाग्य मिल गया। आधी रात तक साहित्यिक चर्चा होती रही। 

मुफलिसी का दौर था, पैदल नाप डाली दिल्ली

अब डंडरियाल जी भी मेरी आत्मीयजनों की सूची में शामिल हो चुके थे। वो जयपाल दा के यहां बराबर आया करते थे। कभी किसी कारणवश नहीं आ पाते तो हम उनके घर चले जाते। तब उनका परिवार गुलाबी बाग में किराये के मकान पर रहता था और उस दौरान वे अपने सुप्रसिद्ध खंडकाव्य नागर्जा (भाग तीन) पर काम कर रहे थे। मित्रवर की साहित्य में कोई रुचि नहीं थी, इसलिए वह अपनी ही दुनिया में रहता। नौकरी भी उसकी अटक-अटक कर चल रही थी, इसलिए खर्चा मेरी ही जेब से होने लगा। मुफलिसी के इस दौर का एक फायदा यह जरूर हुआ कि मैंने दिल्ली के बड़े हिस्से को पैदल नाप और माप डाला। बीसियों दफा तो आफिस आना-जाना भी पैदल ही हुआ। एक बार जब जेब पूरी तरह तरह खाली हो गई तो एक दोस्त से पैसे उधार भी मांगने पडे़। 

उधर नवभारत टाइम्स में नौकरी मिली, इधर दोस्त दगा देने लगा

ऐसी स्थिति में किसी को भी उकताहट होने लगना स्वाभाविक है, पर यहां धैर्य मेरा साथ दे रहा था। मुझे लग रहा था कि मैं परिस्थितियों को अपने अनुकूल ढाल सकता हूं। इसके लिए मैं लगातार प्रयास भी कर रहा था। इसी का नतीजा रहा कि कुछ समय बाद नवभारत टाइम्स में नौकरी मिल गई। पगार थी 2,700 रुपये। उस दौर के हिसाब से यह बहुत अच्छी रकम थी। हालांकि, इसमें से 800 रुपये तो सीधे किराये के चले जाते थे। इधर, मित्र भी सहयोगी की बजाय बोझ की भूमिका में आ गया था। शायद उसने कोटद्वार अपने घर पर बता दिया था कि दिल्ली बहुत दिनों तक रुकने की इजाजत नहीं देने वाली। 

फिर वो दिन भी आया, जब वह बोरिया-बिस्तर समेटने लगा

एक दिन उसने बताया कि पिताजी दिल्ली आने वाले हैं। पर, यह नहीं बताया कि क्यों आने वाले हैं। कुछ दिन वो सचमुच आ भी गए, लेकिन रूम पर नहीं, बल्कि अपनी बहन यानी उसकी बुआ के घर। वहीं उसे भी बुलाया गया। शाम को लौटने पर उसने बताया कि पिताजी ने कोटद्वार में रोड हेड पर दुकान ले ली है, अब वहीं कुछ होगा। साथ ही मुझे सलाह दी कि चाहूं तो फ्लैट अपने पास रख सकता हूं। हालांकि मकान मालिक इसे बेचने का मन भी बना रहा है। प्रकारांतर से शायद वह नहीं चाहता कि मैं वहीं रहूं और सच तो यह है कि मैं खुद भी वहां रहने का इच्छुक नहीं था। इसलिए मैंने उससे कह दिया कि मैं अपनी व्यवस्था देख लूंगा। साथ ही उससे यह भी कह दिया कि वह अपना कोई भी सामान रूम में न छोड़े, मुझे किसी भी वस्तु की जरूरत नहीं है। यहां तक मैंने अपनी एक पैंट, एक जोडी़ जूते और एक स्वेटर भी उसी के हवाले कर दी, क्योंकि पिछले कुछ समय से इन्हें वही इस्तेमाल कर रहा था। 

उससे पहले ही मैंने छोड़ दिया कमरा

वह यहीं नहीं रुका, सामान वगैरह पैक करने के बाद उसने मुझे रूम से बाहर बुलाया और बोला, "यार कुछ पैसे होंगे।" मैं चाहकर भी ना न बोल सका और बोला, "कितने?" "पांच सौ हों तो...", उसने कहा। यह राशि बहुत बडी़ थी और फिर इसे लौटना भी नहीं था। सो, मैंने कहा, "पांच सौ तो नहीं, हां! दो सौ दे सकता हूं।" उसने दो सौ रुपये भी गिद्ध की तरह लपक लिए। किराया मैं चुकता कर ली चुका था। इसलिए बोरिया-बिस्तर समेटा और उसके दिल्ली छोड़ने से पहले ही जयपाल दा के घर पर आ गया। परमानेंट नहीं, बस! कुछ दिन रुकने के लिए। आगे कहां रहना है, यह सोचने के लिए कुछ वक्त तो चाहिए ही था।

Friday, 9 October 2026

10-09-2026 (जब एक पत्रकार को बनना पड़ा कर्मकांडी पंडित)

जब एक पत्रकार को बनना पड़ा कर्मकांडी पंडित 

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मेरठ के एक मंदिर में गुजारे वो दिन, जब स्वतंत्र लेखन के साथ कुंडली निर्माण, छिपकर बनने वाले शिकार-भात और पत्रकारिता के जुनून का दौर चल रहा था

दिनेश कुकरेती

किस्सा वर्ष 1996 का है। दिल्ली से तब मेरा मोह भंग होने लगा था। हवा-पानी के कारण नहीं, तंगहाली के चलते। लेकिन, मैं लौटकर घर भी नहीं आना चाहता था। यह तो परिस्थितियों से हार जाने वाली बात होती। इसलिए मैंने मेरठ में रहने का मन बना लिया। असल में मेरठ मेरे मामाजी रहते हैं। तब वे मलियाना शुगर मिल के मंदिर में पुजारी हुआ करते थे। रहते भी मिल परिसर में ही थे। छडे़-छांटे थे, इसलिए उनके साथ रहने में कोई दिक्कत भी नहीं थी। हां, कभी-कभार गांव से नानी जरूर आ जाया करती थी। इससे मुझे भला क्या दिक्कत होती। बस! मैंने भी दिल्ली से सामान समेटा और आ धमका मेरठ मामा के पास। मन में था कि मामा के साथ पूजा पद्धति और ज्योतिष में पारंगत हो लिया जाए, ताकि जरूरत पड़ने पर रोजी का एक मजबूत विकल्प हमेशा  अपने पास मौजूद रहे।

हुआ भी ऐसा ही। कुछ ही दिनों में मामा ने मिल के मंदिर की सारी जिम्मेदारी मुझे सौंप दी। मसलन, सुबह-शाम मंदिर की साफ-सफाई, पूजा, कीर्तन-भजन, प्रसाद वितरण वगैरह-वगैरह।अब अधिकांश दिनों में सुबह चार बजे से पूर्वाह्न 11 बजे और फिर शाम को चार बजे से रात नौ बजे तक मंदिर की रेख-देख से लेकर पूजा-पाठ तक मैं ही करता था। खाली वक्त में स्वतंत्र लेखन चलता रहता। इस बीच मैंने मामा से गुजारिश की कि किसी अच्छे ज्योतिषी से मिलवा दीजिए, ताकि मैं ज्योतिष की बारीकियां सीख सकूं।



ज्योतिषी का मिला साथ, सीख ली ज्योतिष

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मुझे कर्मकांड से ज्यादा आकर्षित हमेशा ज्योतिष करती रही है। आज भी करती है। ईमानदारी एवं सही ढंग से अध्ययन किया जाए तो यह काफी हद तक गणित और विज्ञान का मिश्रित रूप है। संयोग से एक दिन मामा के साथ मुझे मेरठ के एक जाने-माने ज्योतिषी के पास जाने का मौका मिला। उनका नाम तो याद नहीं रहा, लेकिन थे बडे़ ही आत्मीय और जानकार व्यक्ति। मामा के आग्रह पर उन्होंने फलित ज्योतिष और कुंडली बनाने के कुछ महत्वपूर्ण सूत्र मुझे बताए, जो आज भी मेरी डायरी में नोट हैं। फिर क्या था, मैं जुट गया कुंडली निर्माण में। दो दर्जन से अधिक लोगों की कुंडलियां मैंने बिना कोई शुल्क लिए बनाईं।

पंडितजी के साथ भजन गायक भी

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कर्मकांड भी लगभग मैं पूरा सीख गया था। इससे मामा की यजमानी में मेरा अच्छा-खासा दखल हो गया। जाहिर है पंडितजी होने के नाते हुलिया में भी कुछ तब्दीलियां करनी पड़ीं। अब कुर्ता-पायजामा और धोती-कुर्ता मेरे प्रमुख वस्त्र हो गए। साथ ही भजन-कीर्तन में भी रस आने लगा। सो, घर में खराब पडी़ हारमोनियम को मैंने दुरुस्त करवा लिया। एक मित्र ने ढोलक का भी इंतजाम कर दिया। अब रात का भोजन करने के बाद भजन लहरियां गूंजने लगीं। मैं भजन गायक बन गया, श्रोताओं की तो खैर आस-पड़ोस वैसे भी कमी नहीं थी। मंदिर का चढा़वा भी मामा ने मुझे अपने पास ही रखने के लिए कहा था, सो उससे हर दूसरे-तीसरे दिन चिकन-मटन का भी इंतजाम होने लगा।

पंडितजी का किचन

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पहाड़ के पंडित मांसाहार से परहेज नहीं करते, लेकिन ज्यादातर मैदानी इलाकों में पंडित चिकन-मटन तो छोड़िए लहसुन-प्याज तक नहीं खा सकते। खैर! आस-पडो़स वालों को हमने बता रखा था कि डाक्टर ने हमें लहसुन-प्याज खाने की सलाह दी हुई है। इसलिए उन्हें हमारा लहसुन-प्याज खाना अखरता नहीं था। हां! चिकन-मटन बनाने में बेहद सावधानी बरतनी पड़ती थी। हमारे दो हालनुमा कमरे थे और एक से होकर ही दूसरे का रास्ता खुलता था। सो, भीतरी कमरे में हमने किचन सजा लिया। यहां मैं तेज खुशबू वाली धूप या अगरबत्ती जलाकर चूल्हे में चिकन अथवा मटन का प्रेशर चढा़ता था। आस-पडो़स में सीन ऐसा बना रखा था कि कोई भी भीतर वाले कमरे में प्रवेश न करे। नतीजा, पडो़सी घर पर पहली बार आने वाले व्यक्ति को पहले ही सतर्क कर देते कि भूल से भी पंडितजी के किचन में न जाना।

चावल को पर्दे में रखने की परंपरा ने बचाया सम्मान

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पहाड़ की परंपरा है कि भात (चावल) को हमेशा पर्दे में रखना चाहिए। संयोग देखिए कि इसी परंपरा ने एक बार यजमानों के आक्रोश का शिकार होने, बल्कि पिटने से हमें बचाया। कभी-कभी उस घटना को याद कर मन प्रफुल्लित हो उठता है। उस दिन मैं दोपहर को शिकार-भात (मटन और चावल) बना रहा था। भात पक चुका था, सो मैंने उसे पतीली में पलटकर प्रेशर में मटन चढा़ दिया। इसी बीच क्या हुआ कि पडो़स की एक महिला किसी काम से हमारे यहां आई और मुझे ढूंढते हुए सीधे किचन में घुस गई। उसे यूं अचानक सामने देख कुछ देर के लिए तो मेरा दिमाग सुन्न पड़ गया था। फिर अचानक पता नहीं क्या हुआ कि मैंने भात की पतीली उठाई और उसे बाहर बंधी पड़ोसी की गाय के सामने उडे़ल दिया। यह देख वह महिला ही नहीं, आसपास मौजूद अन्य लोग भी हतप्रभ रह गए। कोई कुछ कहने की स्थिति में नहीं था, लेकिन सब समझ रहे थे कुछ-न-कुछ गड़बड़ तो जरूर हुई है।

गलती किसी की नहीं थी

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आखिरकार साहस जुटाकर उसी महिला ने मुझसे पूछा- "पंडित जी क्या हुआ, चावल क्यों गिरा दिए?" मैं कुछ देर खामोश रहा और फिर बेहद संयत भाव में बोला- "क्या करता, आप किचन में जो आ गईं।" मेरे मुंह से यह बात सुन पडो़सी समझ गए कि पंडितजी का भोजन अपवित्र हो गया, इसीलिए उन्हें चावल गिराने पडे़। अब उस महिला की भी समझ में आ गया था कि माजरा क्या है। साथ ही वह अपराध बोध भी महसूस कर रही थी। सो, धीरे से बोली- "पंडितजी भूल हो गई। मेरे कारण आपको अब चावल दोबारा बनाने पडे़ंगे।" लेकिन, सच तो यही था कि मेरी जान बच गई थी। इसलिए मैं संयत भाव से बोला-"आप क्यों खुद को दोषी मानती हो। भूल तो तब होती, जब आपको कुछ पता होता। क्षमा तो मुझे मांगनी चाहिए कि मेरे कारण आपको यह सब सुनता पडा़। भूल जाइए कि कुछ हुआ। यह तो होनी थी, तभी तो कहा गया है कि होई सोई जो राम रचि राखा।"



नहीं फैलाए किसी के सामने कभी हाथ

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मेरी यह बातें सुन सबके चेहरे खिल उठे। हां! यह फायदा जरूर हुआ कि फिर कभी किसी ने हमारे किचन की ओर झांकने की हिमाकत तक नहीं की। यही तो हम चाहते भी थे। इसका जिक्र मैं ऊपर भी कर चुका हूं। पंडितजी का समाज में रुतबा तो होता ही है, सो मेरा भी था। लेकिन, मैंने कभी भी किसी यजमान से कोई वस्तु नहीं ली। यहां तक कि दक्षिणा की मांग करना भी मेरे स्वभाव में नहीं रहा। हालांकि, यजमान स्वेच्छा से जो-कुछ भी बनता मुझे भेंट दे देते थे और मैं चुपचाप स्वीकार कर लेता था।

जो मिला, परिचितों में बांट दिया, आचरण में रही पत्रकारिता

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शादी-ब्याह के मौके पर यजमान साडी़ आदि वस्त्र भेंट करते तो मैं उन्हें उपहार के रूप में अपनी परिचित महिलाओं को दे देता। सभी से आत्मीय संबंध थे, सो सभी आपस में एक-दूसरे का ख्याल रखते थे। हालांकि, इस सबके बावजूद मैंने लेखन नहीं छोडा़। "अमर उजाला", दिल्ली प्रेस की पत्रिका "सरिता", जम्मू-कश्मीर सरकार की पत्रिका "योजना" आदि में खूब लिखा। आकाशवाणी नजीबाबाद से काव्य गोष्ठी और वार्ता का भी प्रसारण होता रहा। दोपहर के बाद का समय तो मेरा "अमर उजाला" के दफ्तर में ही बीतता था। 

खूब देखी फिल्में, घर के पास ही थी थियेटर

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एक बात और। इस अवधि में मैंने फिल्में भी जमकर देखीं। "हम आपके हैं कौन", "दिल वाले दुल्हनिया ले जाएंगे", "जुरासिक पार्क" जैसी फिल्में तो सात-सात, आठ-आठ बार देखने गया। रात नौ से बारह के शो में तो मैं अमूमन चला जाता था। पास ही रमेश थियेटर था, इसलिए आने-जाने में को दिक्कत नहीं होती थी। तांगा 10 मिनट में पहुंचा देता था। गर्मियों के दिनों में सिनेमा हाल से लौटने के बाद कमरे में जाने के बजाय मैं मंदिर के बरामदे में ही सो जाया करता था।

ज्योतिष पर केंद्रित किया ध्यान, किया धार्मिक ग्रंथों का अध्ययन

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अब मैंने कर्मकांड के बजाय ज्योतिष पर ज्यादा ध्यान देना शुरू कर दिया था। योजना थी कि पार्ट टाइम ज्योतिषी का ही काम करना है। इसमें रुतबा और पैसा, दोनों ही हैं। इसके लिए फलित ज्योतिष, सामुद्रिक शास्त्र, कीरो का अंक ज्योतिष, भृगु संहिता, केरल का रमल ज्योतिष आदि कितनी ही किताबें पढ़ डालीं। श्रीमद्भागवत महापुराण, गीता, रामायण, वेद, कई पुराण व उपनिषद पढ़ने का मौका भी इसी दौरान मिला। इसी की परिणति थी कि मेरी फलित ज्योतिष पर सम्मानजनक पकड़ बन गई।नया-नया शौक था, इसलिए मेरा उत्साह देख कुछ मित्र भी ज्योतिष सीखने का आग्रह करने लगे। मैंने बडे़ मनोयोग से जो कुछ सीखा हुआ था, उन्हें भी सिखा दिया। इसी बीच मन हुआ कि क्यों न हस्तरेखा पढ़ने में भी महारथ हासिल की जाए। सो, गीता प्रेस गोरखपुर से कई किताबें मंगाकर उन्हें पढ़ना शुरू कर दिया। इसके साथ ही ब्रह्म मुहूर्त में गायत्री साधना भी चलने लगी। लेकिन, कहते हैं ना, आप प्रारब्ध को नहीं बदल सकते।

पत्रकारिता का जुनून रहा हावी, पकड़ी घर की राह

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मेरे साथ भी यही हुआ। इतना कुछ सीखने और यजमानों के बीच अच्छी-खासी जगह बनाने के बाद भी पत्रकारिता का जुनून ही मुझ पर हावी रही। मेरा ज्यादातर वक्त खबरों की उधेड़बुन में ही गुजरने लगा। एक दिन मन हुआ कि क्यों न कोटद्वार अपने घर वापस लौट जाऊं, पहाड़ में पत्रकारिता करना ज्यादा बेहतर रहेगा। फिर क्या होना था... "मन इच्छा होती नहीं, हरि इच्छा तत्काल" और मैं घर लौट आया, एक नए सफर की शुरुआत करने।

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When a Journalist Had to Become a Ritualist Priest
Those days spent in a temple in Meerut, a time filled with freelance writing, making horoscopes, secretly cooking 'shikar-bhat' (meat and rice), and an overriding passion for journalism.
By Dinesh Kukreti
The story goes back to the year 1996. By then, I was beginning to fall out of love with Delhi. It wasn't because of the weather or the water, but due to sheer financial hardship. However, I didn’t want to return home defeated either. That would have felt like giving up in the face of circumstances. So, I decided to settle down in Meerut.
As it happened, my maternal uncle lived in Meerut. At the time, he worked as a priest at the temple inside the Maliyana Sugar Mill complex and lived right on the premises. Since he was a bachelor, staying with him wasn't an issue at all. Occasionally, my maternal grandmother would visit from the village, but that didn't bother me either. Without a second thought, I packed up my belongings from Delhi and arrived at my uncle's doorstep in Meerut. My plan was to master the rituals of worship and astrology under his guidance, ensuring I always had a reliable alternative livelihood if the need arose.
And that is exactly what happened. Within a few days, my uncle handed over all the responsibilities of the mill temple to me. This included cleaning the temple morning and evening, performing prayers, leading devotional songs (kirtan-bhajan), and distributing offerings (prasad). On most days, I handled everything from temple upkeep to rituals from 4:00 AM to 11:00 AM, and then again from 4:00 PM to 9:00 PM. In my free time, I kept up with my freelance writing. Meanwhile, I requested my uncle to introduce me to a good astrologer so I could learn the finer nuances of the craft.

Embraced by an Astrologer, Mastering the Craft

Astrology had always fascinated me much more than performing religious rituals; it still does today. If studied honestly and systematically, it is very much a blend of mathematics and science. By a stroke of luck, I accompanied my uncle one day to visit a well-known astrologer in Meerut. I no longer remember his name, but he was a deeply warm and knowledgeable man. At my uncle's request, he taught me some vital principles of predictive astrology and horoscope chart creation—notes that remain preserved in my diary to this day. Armed with this knowledge, I threw myself into making horoscopes. I prepared charts for more than two dozen people entirely free of charge.

A Priest and a Bhajan Singer

I also managed to learn almost the entirety of ritualistic worship. Consequently, I began assisting my uncle significantly in serving his patrons (yajmans). Naturally, playing the role of a pundit required a transformation in my appearance. A kurta-pyjama and dhoti-kurta became my primary attire. I also began to find joy in devotional singing. I got an old, broken harmonium at home repaired, and a friend arranged a dholak drum for me. After dinner, the air would fill with the melodies of bhajans. I became a bhajan singer, and as for an audience, there was never a shortage of listeners in the neighborhood. Moreover, my uncle told me to keep the temple offerings for myself, which soon funded a steady supply of chicken and mutton every two or three days.

The Pundit's Kitchen

Priests from the mountains do not abstain from non-vegetarian food, but in most plains areas, pundits cannot even dream of touching chicken or mutton—let alone garlic and onions. Well, we had told our neighbors that a doctor had advised us to consume garlic and onions for health reasons, so they didn't mind us eating them. However, cooking chicken and mutton required extreme caution.
We lived in a set of two large rooms where the second room could only be accessed by walking through the first. We set up our kitchen in the inner room. There, I would light strong-scented incense sticks before putting the chicken or mutton into the pressure cooker on the stove. We maintained an unwritten rule in the neighborhood that no one was to enter the inner room. As a result, neighbors would proactively warn anyone visiting our house for the first time: "Make sure you don't accidentally step into Punditji's kitchen!"

Saved by the Tradition of Veiling the Rice

There is a tradition in the mountains that bhat (cooked rice) should always be kept covered or shielded from sight. By a twist of fate, it was this very tradition that once saved us from the wrath—and perhaps a physical beating—of our patrons. Even today, remembering that incident makes me chuckle.
That afternoon, I was preparing shikar-bhat (mutton and rice). The rice was done, so I emptied it into a pot and put the mutton in the pressure cooker. Just then, a neighborhood woman came over for some chore and walked straight into the kitchen looking for me. Seeing her suddenly standing there froze my brain for a moment. Then, driven by a sudden instinct, I picked up the pot of cooked rice and threw it right in front of a neighbor's cow tied outside.
The woman, along with the other onlookers outside, stood completely dumbfounded. No one knew what to say, but everyone sensed that something was amiss.

Nobody’s Fault

Finally, gathering her courage, the woman asked me, "Punditji, what happened? Why did you throw away the rice?"
I remained silent for a moment and then said in a deeply calm, measured voice, "What else could I do? You walked right into the kitchen."
Hearing this, the neighbors immediately assumed that the priest's food had been rendered impure by the intrusion, which is why he had to discard the rice. The woman realized what had happened and, struck by a wave of guilt, softly said, "Punditji, it was my mistake. Because of me, you will have to cook the rice all over again."
In reality, I had just narrowly escaped disaster. Maintaining my composed demeanor, I replied, "Why blame yourself? It would be a mistake only if you did it knowingly. I should be the one apologizing that you had to witness this. Let's just forget it happened. It was meant to be. As they say, what Rama has ordained is bound to happen."

Never Begged Before Anyone

Hearing my words, everyone’s faces lit up. There was one major benefit to this incident: no one ever dared to peek into our kitchen again, which was exactly what we wanted all along.
As I mentioned earlier, a pundit commands significant respect in society, and so did I. Yet, I never demanded anything from any patron. Asking for monetary offerings (dakshina) was simply against my nature. Whatever the patrons gave out of their own goodwill, I accepted quietly.

Journalism in Practice, Generosity in Life

During weddings, when patrons gifted sarees and other clothing, I would pass them on as gifts to women we knew. We shared warm relations with everyone, and the community looked out for one another.
Despite everything, I never abandoned my writing. I wrote extensively for publications like Amar Ujala, Delhi Press's magazine Sarita, and the Jammu and Kashmir government's journal Yojana. I also broadcasted poetry sessions and talks on All India Radio (Akashvani) Najibabad. In fact, most of my afternoons were spent at the Amar Ujala office.

Movie Marathons and Nearby Theatres

Another detail about this period: I watched movies relentlessly. I went to see blockbusters like Hum Aapke Hain Koun..!, Dilwale Dulhania Le Jayenge, and Jurassic Park seven or eight times each. I regularly went to the late-night 9:00 PM to 12:00 AM shows. The Ramesh Theatre was nearby, making commuting effortless; a horse-carriage (tanga) would get me there in ten minutes. During the summer, instead of retreating to the room after returning from the cinema, I would simply sleep in the temple veranda.

Deepening the Study of Astrology and Scriptures

Eventually, I shifted my focus from performing rituals to mastering astrology completely. My plan was to practice as a part-time astrologer, a profession that offered both status and good money. To this end, I devoured countless books on predictive astrology, palmistry (Samudrik Shastra), Cheiro’s numerology, the Bhrigu Samhita, and Kerala's Ramal astrology. It was during this phase that I also had the opportunity to read the Shrimad Bhagavatam, the Bhagavad Gita, the Ramayana, the Vedas, and several Puranas and Upanishads. As a result, I developed a commendable command over predictive astrology.
Since it was a newly acquired passion, my enthusiasm caught the attention of a few friends who requested me to teach them. I gladly taught them everything I had learned with deep dedication. Around the same time, I decided to master palmistry further, ordering several books from Gita Press, Gorakhpur. Alongside this, I began practicing Gayatri meditation during the Brahma Muhurta (the auspicious hours before dawn). But as the saying goes, you cannot rewrite your destiny.

The Passion for Journalism Prevails: Heading Home

The same held true for me. Despite learning so much and carving out a respectable place among the community, my overriding passion for journalism refused to fade. Most of my time was spent untangling and chasing news stories. One day, the urge struck me to return home to Kotdwar, feeling that practicing journalism back in the mountains would be far more fulfilling.
And then, as they say, "Human desires fade instantly when the divine will takes over." I packed up and returned home to embark on a brand new journey.

Wednesday, 7 October 2026

07-10-2026 (कोटद्वार ही है पौराणिक कौमुदी क्षेत्र )

कोटद्वार नगर का विहंगम नजारा


कनिंघम के अनुसार ह्वेनसांग ने कोटद्वार को मंडावर से 50 मील (80.5 किमी) दूर बताया है, लेकिन हरिद्वार का कहीं जिक्र नहीं किया। हालांकि, इसमें कोई शंका नहीं कि कोटद्वार और हरिद्वार, दोनों ही नगर मुगलकाल में विद्यमान थे। कई विद्वानों का मानना है कि पौराणिक कौमुद तीर्थ (कौमुदी क्षेत्र) कोटद्वार ही है। विद्वानों के अनुसार ‘स्कंद पुराण’ के केदारखंड में अध्याय 115 से लेकर 117 तक में वर्णित कौमुद तीर्थ के लक्षण एवं दिशाएं इस स्थान को कौमुद तीर्थ होने का गौरव देते हैं।

कोटद्वार ही है पौराणिक कौमुदी क्षेत्र 
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दिनेश कुकरेती
गढ़वाल का प्रमुख नगर कोटद्वार कब अस्तित्व में आया होगा, इस बारे में ठीक-ठीक कह पाना मुश्किल है। दौलू जागरी के जागरों से पता चलता है कि कोटद्वार का इतिहास बहुत पुराना है। हालांकि, हमारे पास ऐसा कोई प्रमाण नहीं है, जो कोटद्वार को एक वैदिक नगर के रूप में प्रतिष्ठित करता हो। महाकवि कालीदास ने भी अपने ग्रंथों में न तो कोटद्वार का जिक्र किया है, न हरिद्वार का ही। हां! सातवीं सदी में भारत आए चीनी यात्री ह्वेनसांग ने जरूर अपनी प्रसिद्ध पुस्तक ‘सी-यू-की’ में गंगाद्वार और मायापुर का जिक्र किया है, किंतु हरिद्वार के बारे में कुछ नहीं कहा। ह्वेनसांग मंडावार, गंगाद्वार व मायापुर भी गए। साथ ही उन्होंने गंगा के किनारे सौ मील (161 किमी) आगे की यात्रा भी की और वहां के एक सुंदर नगर का वर्णन किया। यह नगर श्रीनगर गढ़वाल या उत्तरकाशी हो सकता है। इसी तरह सर अलेक्जेंडर कनिंघम ने 19वीं सदी में ह्वेनसांग की तरह भारत का भ्रमण किया। उन्होंने उत्तराखंड को ब्रह्मपुर लिखा है और तब यहां कत्यूरी राज होने का उल्लेख किया है। गढ़वाल में धनपुर और पोखरी स्थित तांबे की खानों का उल्लेख भी उनके दस्तावेजों में है। कनिंघम के अनुसार ह्वेनसांग ने कोटद्वार को मंडावर से 50 मील (80.5 किमी) दूर बताया है, लेकिन हरिद्वार का कहीं जिक्र नहीं किया। हालांकि, इसमें कोई शंका नहीं कि कोटद्वार और हरिद्वार, दोनों ही नगर मुगलकाल में विद्यमान थे।

सन् 1892 में बना कोटद्वार रेलवे स्टेशन
 
कण्वाश्रम व मोरध्वज से कोटद्वार का संबंध
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कई विद्वानों का मानना है कि पौराणिक कौमुद तीर्थ (कौमुदी क्षेत्र) कोटद्वार ही है। विद्वानों के अनुसार ‘स्कंद पुराण’ के केदारखंड में अध्याय 115 से लेकर 117 तक में वर्णित कौमुद तीर्थ के लक्षण एवं दिशाएं इस स्थान को कौमुद तीर्थ होने का गौरव देते हैं। स्कंद पुराण के अध्याय-116 के श्लोक छह में कौमुद तीर्थ के चिह्नों के बारे में बताया गया है कि- ‘तस्य चिह्नं प्रवक्ष्यामि यथा तज्ज्ञायते परम, कुमुदस्य तथा गन्धो लक्ष्यते मध्यरात्रके’ अर्थात महारात्रि में कुमुद यानी बबूल के पुष्प की गंध लक्षित होती है। प्रमाण के लिए आज भी इस स्थान के चारों और बबूल के वृक्ष विद्यमान हैं। कौमुद तीर्थ के विषय में कहा गया है कि पूर्वकाल में इस तीर्थ में कौमुद यानी कार्तिक पूर्णिमा को चंद्रमा ने भगवान शिव को तप कर प्रसन्न किया था, इसलिए इस स्थान का नाम कौमुद पड़ा। संभवतः कौमुद द्वार होने के कारण ही इस शहर का कोटद्वार नाम पड़ा। लेकिन, अंग्रेजों के सही उच्चारण न कर पाने के कारण वह इसे ‘कोड्वार’ कहकर पुकारने लगे, जिसे उन्होंने सरकारी अभिलेखों में ‘कोड्वार’ ही दर्ज किया। बाद में इसका अपभ्रंश रूप ‘कोटद्वार’ नाम प्रसिद्ध हुआ। कोटद्वार शब्द का संधि विच्छेद करें तो कोट माने ‘पहाड़’ और द्वार माने ‘दरवाजा’ होता है यानी पहाड़ का प्रवेश द्वार। पहले कोटद्वार से होते हुए ही गढ़वाल की राह खुलती थी। सो, नगर का कोटद्वार नाम पड़ने के पीछे यह एक बडी़ वजह हो सकती है। प्रचलित मान्यता भी यही है कि पहाड़ का प्रवेश द्वार होने के कारण इस नगर को कोटद्वार नाम मिला। यहां यह बता देना भी प्रासंगिक होगा कि कोटद्वार का कण्वाश्रम व मोरध्वज के साथ कोई-न-कोई संबंध जरूर रहा। 

कोटद्वार का वीरबाला तीलू रौतेली चौक



कण्वाश्रम से व्यासघाट के रास्ते होती थी बदरी-केदार यात्रा
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अपने दौर के प्रसिद्ध साप्ताहिक ‘सत्यपथ’ के संपादक ललिता प्रसाद नैथानी अपनी पुस्तक ‘मालिनी सभ्यता के खंडहर’ में लिखते हैं कि पुराने जमाने में बदरीनाथ धाम की यात्रा कण्वाश्रम होते हुए ही शुरू होती थी। यात्री कण्वाश्रम से व्यासघाट और व्यासघाट से देवप्रयाग व श्रीनगर होते हुए बदरी-केदार धाम जाते थे। बदरी-केदार की यात्रा से पहले कण्वाश्रम के दर्शन यात्रियों के लिए शुभ माने जाते थे। यह वह दौर है, जब हरिद्वार का कोई अस्तित्व नहीं था। हरिद्वार की चलती तो वहां रेल पहुंचने के बाद हुई। जबकि, कण्वाश्रम की ख्याति तो बदरीनाथ की ही भांति पुराकाल से ही रही है। महाकवि कालीदास ने अपने प्रसिद्ध ग्रंथ ‘अभिज्ञान शाकुंतलम’ में कण्वाश्रम और मालिनी नदी का जैसा समदृष्ट वर्णन किया है, वैसा बिना देखे संभव ही नहीं है।

कोटद्वार रेलवे स्टेशन


मुगलकाल में बढ़ापुर तक थी गढ़वाल की सरहद
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बौद्धकाल में ह्वेनसांग की यात्रा के दौरान भी कोटद्वार क्षेत्र अस्तित्व में था। नजीबाबाद के पास मोरध्वज का किला इसका प्रमाण है। ह्वेनसांग और कनिंघम ने मंडावर से 50 मील उत्तर में कोटद्वार का अस्तित्व बताया है। उनके लेखों से मालूम होता है कि कोटद्वार, हरिद्वार से बहुत पुराना नगर है। मुगलकाल में तो कोटद्वार एक खाता-पीता क्षेत्र हुआ करता था। तब गढ़वाल की सरहद बढ़ापुर तक थी और हरिद्वार, कनखल, चंडीघाट व लालढांग क्षेत्र भी गढ़वाल में ही था। उस दौरान गढ़वाल के राजा ने कोटद्वार क्षेत्र में कई जागीर अपने जागीरदारों को बख्शी हुई थीं। औरंगजेब के जमाने के 16वीं सदी के एक दस्तावेज से ज्ञात होता है कि तब चौकी-कोटद्वार वहां था, जहां पुरिया नैथानी को महाराज फतेपति शाह ने दो हजार बीघा भूमि जागीर में दी थी। पुरिया नैथानी के वंशज आज भी जशोधरपुर में रह रहे हैं। चौकी यानी चौकीघाटा आज भी मौजूद है। यही चौकीघाटा वर्ष 1924 तक भरपूर मंडी हुआ करता था, लेकिन 1924 की बाढ़ ने इस मंडी का अस्तित्व मिटा डाला। इसके अवशेष अब भी वहां देखे जा सकते हैं। उक्त दस्तावेज में मौजूद नेगियों और भंडारियों के दस्तखत प्रमाण हैं कि चौकी-कोटद्वार मालिनी नदी के तट पर रहा होगा। राजा भीम सिंह का गांव भीमसिंहपुर और उनकी संतानें आज भी मौजूद हैं, लेकिन भंडारियों के बारे में फिलहाल कोई जानकारी उपलब्ध नहीं है।

कोटद्वार का प्रसिद्ध सिद्धबली धाम


गोरख्याणी राज में उजाड़ हुआ कोटद्वार-भाबर
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19वीं सदी के आरंभ में गोरख्याणी ने गढ़वाल और भाबर को तहस-नहस कर उसकी तस्वीर ही बदल डाली थी। वर्ष 1816 में गोरख्याणी का पराभव हुआ और अंग्रेज़ी राज ने दस्तक दी। कोटद्वार-भाबर तब उजाड़ अवस्था में पहुंच चुका था। खैर! वर्ष 1879 में डिप्टी कमिश्नर चार्ल्स थॉमस ग्रास्टन ने गढ़वाल भाबर को दोबारा बसाने की शुरुआत की। खोह नदी के बायीं ओर सिद्धबली मंदिर और खाम बागीचे के बीच पुराना कोटद्वार बसाया गया, जिसके भग्नावशेष आज भी अपने प्रारंभिक काल की गाथाएं सुना रहे हैं। तब यह भू-भाग बीहड़ जंगलों से घिरा हुआ था और यहां तकरीबन दो हजार की आबादी निवास करती थी। लेकिन, यह कोटद्वार भी कालांतर में खोह में आई बाढ़ की भेंट चढ़ गया।

कोटद्वार में स्थित एशिया का सबसे बड़ा चर्च


...और इस तरह बदलती गई कोटद्वार नगर की तस्वीर
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इस बीच वर्ष 1892 में कोटद्वार में रेल आ चुकी थी। हिमालय क्षेत्र का प्रवेश द्वार होने के नाते कोटद्वार रेल मार्ग का उपयोग हिमालय क्षेत्र से लकड़ी परिवहन के लिए किया गया था। प्रथम यात्री ट्रेन यहां वर्ष 1901 में आई। वर्ष 1917 में खाम सुपरिटेंडेंट पं. गंगा दत्त जोशी ने खोह नदी के पश्चिम में नए सिरे से कोटद्वार नगर को बसाना शुरू किया। हालांकि, इस सब के बावजूद वर्ष 1930 तक यहां कुछ ही मकान बन पाए थे और शिक्षा के नाम पर एकमात्र प्राइमरी स्कूल था। सही मायने में कोटद्वार को पूरी तरह व्यवस्थित करने का श्रेय डिप्टी कमिश्नर जेएच बर्नार्ड को जाता है। वर्ष 1939 में उन्होंने कोटद्वार के लिए एक प्लान तैयार किया, जो वर्ष 1943 में कार्यान्वित हो पाया। इसमें गढ़वाल मोटर ऑनर्स यूनियन लिमिटेड (जीएमओयू) के संस्थापक उमानंद बड़थ्वाल का भी योगदान रहा। वर्ष 1949 में नोटिफाइड एरिया कमेटी बनने के बाद वर्ष 1951 में कोटद्वार नगर का प्रबंधन नगर पालिका समिति के हाथ में आ गया। तब कोटद्वार की आबादी 8,148 थी।  धीरे-धीरे कोटद्वार की तरक्की के द्वार खुलते गए और यह एक सुविधा-संपन्न शहर बनता चला गया। आज कोटद्वार गढ़वाल ही नहीं, उत्तराखंड का भी प्रमुख शहर है।
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खोह नदी पर बने पुल से सिद्धबली धाम का विहंगम नजारा

According to Cunningham, Xuanzang (Hiuen Tsang) located Kotdwar 50 miles (80.5 km) away from Mandawar, but made no mention of Haridwar. However, there is no doubt that both Kotdwar and Haridwar existed during the Mughal era. Many scholars believe that the mythological Kaumud Teerth (Kaumudi Kshetra) is none other than Kotdwar itself. According to experts, the characteristics and directions of Kaumud Teerth described in chapters 115 to 117 of the Kedarkhand in the 'Skanda Purana' bestow this place with the honor of being Kaumud Teerth.

Kotdwar is Indeed the Mythological Kaumudi Region

By Dinesh Kukreti
It is difficult to pinpoint exactly when Kotdwar, a prominent town in Garhwal, came into existence. Legends from Daulu Jagari's Jagars (traditional ritual folk songs) suggest that Kotdwar has a very ancient history. However, we lack definitive evidence to establish Kotdwar as a Vedic town. The great poet Kalidasa made no mention of either Kotdwar or Haridwar in his texts.
On the other hand, the Chinese traveler Xuanzang, who visited India in the 7th century, explicitly mentioned Gangadwar and Mayapur in his famous book 'Si-Yu-Ki', but remained silent about Haridwar. Xuanzang visited Mandawar, Gangadwar, and Mayapur. He also traveled a hundred miles (161 km) further along the banks of the Ganges, where he described a beautiful city. This city could have been Srinagar Garhwal or Uttarkashi.
Similarly, Sir Alexander Cunningham traveled across India in the 19th century, retracing Xuanzang's footsteps. He referred to Uttarakhand as 'Brahmapur' and noted that it was ruled by the Katyuri dynasty at the time. His documents also mention the copper mines located in Dhanpur and Pokhari in Garhwal. According to Cunningham, Xuanzang stated that Kotdwar was 50 miles (80.5 km) from Mandawar, but omitted any mention of Haridwar. Nevertheless, there is no question that both Kotdwar and Haridwar were thriving towns during the Mughal period.
कोटद्वार से 14 किमी की दूरी पर स्थित कण्वाश्रम

The Connection of Kotdwar with Kanvashram and Mordhwaj

Many scholars believe that the mythological Kaumud Teerth (Kaumudi Kshetra) is indeed Kotdwar. According to experts, the characteristics and directions of Kaumud Teerth described in chapters 115 to 117 of the Kedarkhand in the 'Skanda Purana' honor this location as the true Kaumud Teerth. Verse 6 of Chapter 116 of the Skanda Purana describes the signs of Kaumud Teerth: ‘Tasya Chihnam Pravakshyami Yatha Tajjnayate Param, Kumudasya Tatha Gandho Lakshyate Madhyaratrake’—meaning, at midnight, the fragrance of the Kumud (Acacia/Babool) flower can be perceived. As proof, Acacia trees can still be found surrounding this area today.
Regarding Kaumud Teerth, it is said that in ancient times, the Moon performed penance here during Kaumud (Kartik Purnima) to please Lord Shiva, which is why the place was named Kaumud. It is highly likely that being the gateway to Kaumud (Kaumud Dwar), the town came to be known as Kotdwar. However, due to the British mispronouncing it, they began calling it 'Kodwar' and recorded it as such in official government archives. Later, its corrupted phonetic form, 'Kotdwar', became popular.
When broken down grammatically, the word Kotdwar means Kot (mountain) and Dwar (gateway)—signifying the gateway to the mountains. In earlier times, the route to Garhwal opened exclusively through Kotdwar, which could be a major reason behind its name. Popular belief also holds that the town earned this name because it serves as the entrance to the hills. It is also relevant to mention that Kotdwar certainly shares a historical or cultural connection with Kanvashram and Mordhwaj.

The Badri-Kedar Yatra Routed via Kanvashram and Vyasghat

Lalita Prasad Naithani, the editor of the famous weekly newspaper 'Satyapath' of his era, writes in his book 'Malini Sabhyata Ke Khandahar' (The Ruins of Malini Civilization) that in ancient times, the pilgrimage to Badrinath Dham used to begin through Kanvashram. Pilgrims would travel from Kanvashram to Vyasghat, and then proceed to Badri-Kedar Dham via Devprayag and Srinagar. Seeking blessings at Kanvashram before embarking on the Badri-Kedar pilgrimage was considered highly auspicious.
This was a time when Haridwar had no prominent existence; Haridwar's popularity only soared after the railway reached there. In contrast, Kanvashram has enjoyed immense renown since antiquity, much like Badrinath. The vivid and balanced description of Kanvashram and the Malini River by the great poet Kalidasa in his masterpiece 'Abhijnana Shakuntalam' would have been impossible to write without having seen it firsthand.
कोटद्वार के कालाबड़ में स्थित एशिया का सबसे बड़ा चर्च

Garhwal's Border Extended up to Barhapur in the Mughal Era

During the Buddhist period and Xuanzang's travels, the Kotdwar region was already well-established. The fort of Mordhwaj near Najibabad stands as a testament to this. Xuanzang and Cunningham both documented the existence of Kotdwar 50 miles north of Mandawar. Their writings indicate that Kotdwar is a much older town than Haridwar.
During the Mughal era, Kotdwar was a prosperous region. At that time, the border of Garhwal extended up to Barhapur, and areas like Haridwar, Kankhal, Chandighat, and Laldhang were also part of the Garhwal kingdom. During this period, the King of Garhwal granted several jagirs (land grants) to his feudatories in the Kotdwar region. A 16th-century document from the era of Aurangzeb reveals that 'Chauki-Kotdwar' was located where Maharaja Fatehpati Shah had granted two thousand bighas of land as a jagir to Puriya Naithani. The descendants of Puriya Naithani still reside in Jasodharpur today.
The outpost, known as Chauki or Chaukighata, still exists. This very Chaukighata served as a bustling market (mandi) until 1924, but the devastating floods of 1924 completely erased it. Its ruins can still be seen there. The signatures of Negis and Bhandaris on the aforementioned historical document prove that Chauki-Kotdwar must have been situated on the banks of the Malini River. King Bhim Singh's village, Bhimsinghpur, and his descendants still exist today, though no information is currently available regarding the Bhandaris.

Kotdwar-Bhabar Lay Desolate During the Gorakhayani Rule

At the beginning of the 19th century, the Gorakhayani (Gorkha rule) devastated Garhwal and Bhabar, completely altering its landscape. In 1816, the Gorkha rule collapsed, ushering in the British Raj. By then, Kotdwar-Bhabar had turned completely desolate. Eventually, in 1879, Deputy Commissioner Charles Thomas Gaston began the resettlement of Garhwal Bhabar.
Old Kotdwar was established on the left bank of the Khoh River, between the Siddhabali temple and Kham Bagicha; its ruins still tell the tales of its early days. Back then, this terrain was surrounded by dense, wild forests and was home to a population of about two thousand people. However, this version of Kotdwar was also lost to subsequent floods in the Khoh River.

...And This is How the Face of Kotdwar Town Changed

Meanwhile, the railway arrived in Kotdwar in the year 1892. Serving as the gateway to the Himalayan region, the Kotdwar rail route was initially used to transport timber out of the mountains. The first passenger train arrived here in 1901. In 1917, Kham Superintendent Pt. Ganga Dutt Joshi began rebuilding and planning Kotdwar town afresh on the western side of the Khoh River.
Despite these efforts, only a few houses had been built here by 1930, and the town had just a single primary school for education. The true credit for systematically organizing Kotdwar goes to Deputy Commissioner J.H. Barnard. In 1939, he drafted a comprehensive master plan for Kotdwar, which was finally implemented in 1943. Umanand Barthwal, the founder of Garhwal Motor Owners Union Limited (GMOU), also contributed significantly to this layout.
Following the formation of the Notified Area Committee in 1949, the management of Kotdwar town was handed over to the Municipal Committee in 1951. At that time, Kotdwar’s population stood at 8,148. Gradually, the doors of progress opened for Kotdwar, and it transformed into a well-equipped, resource-rich city. Today, Kotdwar is a major urban hub, not just for Garhwal, but for the entire state of Uttarakhand.

12-10-2026 (किरायेदार)

किरायेदार  -------------- दिनेश कुकरेती अ ब तक के जीवन में मैं ज्यादातर समय किरायेदार की भूमिका में ही रहा। पहले परिवार के साथ और बाद में अक...