Tuesday, 29 September 2026

29-09-2026 (अपनी मातृभाषा को दिलाएं उसका सही एवं गौरवपूर्ण स्थान)












अपनी मातृभाषा को दिलाएं उसका सही एवं गौरवपूर्ण स्थान

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आप चाहते हैं कि हमारी मातृभाषा गढ़वाली, कुमाऊंनी व जौनसारी को संविधान की आठवीं अनुसूची में स्थान मिले तो इस अवसर को हाथ से जाने न देना। मुझे पूरा भरोसा है कि जनगणना प्रपत्र में 14वें सवाल के आगे मातृभाषा दर्ज कराकर आप अपनी संस्कृति, पहचान और भाषाई विरासत को अक्षुण्ण बनाए रखने में अमूल्य योगदान देंगे

दिनेश कुकरेती

उत्तराखंड के दुर्गम व हिमाच्छादित क्षेत्रों में जनगणना का कार्य पूरा कर लिया गया है और अब नवंबर में शेष प्रदेश में गणना की तैयारी है। उत्तराखंड में अगले साल विधानसभा चुनाव होने हैं, इसलिए यहां गणना का कार्य पहले कराया जा रहा है। इसके तहत आगामी 16 नवंबर से 30 नवंबर तक स्व-गणना और एक दिसंबर 2026 से चार जनवरी 2027 तक मुख्य गणना होगी। इसके बाद पांच से नौ जनवरी तक डेटा सुधार का कार्य होगा। मुख्य गणना के दौरान गणनाकर्मी घर-घर जाकर डेटा जुटाएंगे। इस दौरान परिवार के प्रत्येक व्यक्ति से 40 सवाल पूछे जाएंगे, जिनका उसे सही-सही जवाब देना होगा।

इनमें 14वें नंबर का सवाल मातृभाषा संबंधी है। यानी जनगणना प्रपत्र के इस कॉलम में आपको आपकी मातृभाषा दर्ज करानी होगी। आप चाहते हैं कि हमारी मातृभाषा गढ़वाली, कुमाऊंनी व जौनसारी को संविधान की आठवीं अनुसूची में स्थान मिले तो इस अवसर को हाथ से जाने न देना। मुझे पूरा भरोसा है कि जनगणना प्रपत्र में मातृभाषा दर्ज कराकर आप अपनी संस्कृति, पहचान और भाषाई विरासत को अक्षुण्ण बनाए रखने में अमूल्य योगदान देंगे।

मितरों! जनगणना केवल सिर गिनने का काम नहीं है। यह हमारे अस्तित्व, हमारी संस्कृति और हमारी जड़ों के दस्तावेजीकरण का एक ऐतिहासिक अवसर है। क्योंकि, सरकारी आंकड़ों में किसी भाषा को बोलने वालों की संख्या जितनी अधिक होगी, उस भाषा के संरक्षण के लिए नीतियां उतनी ही मजबूत बनेंगी। यह भी न भूलें कि मातृभाषा ही हमारी असली पहचान है। यदि हम आज चूक गए तो आने वाली पीढ़ियां अपनी ही भाषा से महरूम हो सकती हैं। याद रहे कि अक्सर लोग अनजाने या किसी अन्य कारण से अपनी स्थानीय भाषा या मातृभाषा के बजाय किसी अन्य बड़ी भाषा का नाम लिखवा देते हैं। इससे हमारी मूल भाषा के आंकड़े कम हो जाते हैं और वह कागजों में सिमटने लगती है।

इसलिए जब जनगणना कर्मी आपसे आपकी मातृभाषा पूछे तो बिना किसी झिझक अपनी मूलभाषा का नाम दर्ज कराएं। सुनिश्चित करें कि जो भाषा आपने बोली है, वही प्रपत्र में लिखी गई है। अपने परिवार, पड़ोसियों और रिश्तेदारों को भी इसके प्रति जागरूक करें। भाषा सिर्फ संवाद का माध्यम नहीं, हमारी संस्कृति की आत्मा है। अपनी आत्मा को जीवित रखना हम सबका सामूहिक दायित्व है। आइए! इस राष्ट्रीय कर्तव्य में अपनी भागीदारी सुनिश्चित करें और अपनी मातृभाषा को उसका सही एवं गौरवपूर्ण स्थान दिलाएं।

इन्हें भी पढ़ें - 

जनगणना प्रपत्र में पूछे जाने वाले 40 सवाल

व्यक्तिगत और पारिवारिक जानकारी

01. व्यक्ति का नाम

02. परिवार के मुखिया से संबंध

03. लिंग (पुरुष/महिला/अन्य)

04. जन्म तिथि और उम्र (पूर्ण वर्षों में)

05. वर्तमान वैवाहिक स्थिति

06. विवाह के समय उम्र (पूर्ण वर्षों में)

07. पति/पत्नी का नाम (नया सवाल)

08. घोषित राष्ट्रीयता (नया सवाल)

09. धर्म

10. अनुसूचित जाति (SC) / अनुसूचित जनजाति (ST) / जाति का नाम (आजाद भारत में पहली बार सभी जातियों का नाम दर्ज होगा)

11. पिता का विवरण (नया सवाल)

12. माता का विवरण (नया सवाल)

13. दिव्यांगता/निःशक्तता (यदि कोई हो)

शिक्षा और भाषा

14. मातृभाषा और अन्य जानी जाने वाली भाषाएं

15. साक्षरता और डिजिटल साक्षरता की स्थिति (नया सवाल)

16. शैक्षणिक संस्थान में उपस्थिति की स्थिति (क्या अभी पढ़ाई कर रहे हैं?)

17. सर्वोच्च शैक्षणिक स्तर और पढ़ाई की स्ट्रीम/विषय

आर्थिक गतिविधि और रोज़गार

18. क्या पिछले एक साल में कभी भी काम किया है?

19. आर्थिक गतिविधि की श्रेणी (मुख्य कामगार, सीमांत कामगार या गैर-कामगार)

20. व्यवसाय/पेशा

21. उद्योग, व्यापार या सेवा की प्रकृति

22. कामगार की श्रेणी (कर्मचारी, नियोक्ता, स्वयं का काम करने वाले, या पारिवारिक कामगार)

23. गैर-कार्यकर्ता होने की स्थिति में मुख्य गतिविधि (जैसे छात्र, गृहणी, आश्रित आदि)

24. क्या काम की तलाश में हैं या काम के लिए उपलब्ध हैं?

25. काम के स्थान तक जाने का माध्यम/यात्रा का साधन

26. काम की जगह तक जाने-आने में लगने वाला समय/दूरी

जन्मस्थान और प्रवासन/पलायन

27. जन्म स्थान (गांव, कस्बा, राज्य या देश)

28. पूर्व निवास स्थान (इससे पहले आप कहां रहते थे?)

29. पूर्व निवास स्थान से प्रवासन (Migration) का मुख्य कारण

30. प्रवासन की अवधि (वर्तमान स्थान पर कितने समय से रह रहे हैं?)

31. स्थायी आवासीय पता (नया सवाल)

प्रजनन क्षमता और स्वास्थ्य

32. जीवित बच्चों की कुल संख्या (पुरुष और महिला अलग-अलग)

33. अब तक जन्मे कुल बच्चों की संख्या

34. पिछले एक साल के भीतर जन्मे बच्चे की जानकारी

पहचान, दस्तावेज़ और बैंक खाते (ये सवाल 'यदि उपलब्ध हों' की श्रेणी में हैं, यानी अनिवार्य नहीं हैं)

35. कोविड-19 टीकाकरण का स्थान (नया सवाल)

36. बैंक खातों की कुल संख्या (नया सवाल)

37. मोबाइल नंबर (नया सवाल)

38. आधार नंबर (नया सवाल)

39. वोटर आईडी (मतदाता पहचान पत्र) नंबर (नया सवाल)

40. पासपोर्ट या ड्राइविंग लाइसेंस का विवरण (नया सवाल)


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Friday, 18 September 2026

18-09-2026 (सावधान! अंदर कुत्ता है)

सावधान! अंदर कुत्ता है
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दिनेश कुकरेती
मु
झे पहली बार 1990 में दूनघाटी को देखने का सौभाग्य मिला था। तब मैं ग्रेज्युएशन कर रहा था और किसी प्रतियोगी परीक्षा के सिलसिले में दून आया था। मुझे अच्छी तरह याद है, उस दौरान मैं तीन दिन अपने दोस्त के पिता के घर नेहरूग्राम में रुका था। वे सेना से सेवानिवृत्त होने के बाद ऑर्डिनेंस फैक्ट्री में नौकरी कर रहे थे और किराये पर मकान लेकर रहते थे। हालांकि, मैंने परीक्षा तो नहीं दी, लेकिन शहर को खूब घूमा।खासकर पलटन बाजार, राजपुर रोड, ईसी रोड, गांधी पार्क आदि स्थानों की खूबसूरती का जी-भरकर दीदार किया। तब इस शहर की खूबसूरती देखते ही बनती थी। चारों ओर नहरों का जाल बिछा हुआ था, जिनमें साफ पानी बहता था। शाम के वक्त नहरों के किनारे ठंडी हवाएं अंतर्रात्मा को प्रफुल्लित कर देतीं। वैसे इससे पहले मैं लखनऊ भी काफी घूम चुका था, लेकिन दून में जो अनुभूति हुई, वह अपने आप में अलग तरह की थी। तब शहर काफी सिमटा हुआ था। हर तरफ सड़क के किनारे बाग-बागीचे नजर आते थे। ट्रैफिक भी बहुत ज्यादा नहीं था। ऐसे में सड़कों पर टहलने का आनंद ही कुछ और होता था।




महीना तो याद नहीं रहा, पर वह इतवार का दिन था। मैंने भी सुबह नौ बजे के आसपास बस पकडी़ और परीक्षा देने निकल पडा़। चुक्खूवाला क्षेत्र के किसी विद्यालय (शायद श्री गुरु नानक पब्लिक इंटर कॉलेज) में सेंटर पडा़ था। बस चकराता रोड की तरफ नहीं जाती थी, इसलिए कंडक्टर ने घंटाघर के पास ही उतार दिया। खैर! सेंटर नजदीक ही था, सो मैं पैदल ही उस ओर चल पडा़। थोडी़ दूर ही गया हूंगा कि अचानक मन में ख्याल आया, तैयारी तो है नहीं, खामखां क्यों तीन घंटे खराब किए जाएं।


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बस! फिर क्या था, बगैर मन में तनाव लाए मैं शहर भ्रमण पर निकल गया। किधर जाना है, यह कुछ तय नहीं था। सो, जिधर मन करता, राह पकड़ लेता। अब मैं एक पाश कालोनी के आगे खडा़ था। दरअसल, वहां एक बडी़-सी कोठी के गेट पर लगे बोर्ड को देखकर मेरे कदम ठिठक गए थे। बोर्ड पर लिखा था, "सावधान! अंदर कुत्ता है।" मेरे लिए यह किसी आश्चर्य से कम नहीं था, क्योंकि मैं जीवन में पहली दफा किसी घर के गेट पर ऐसा दुर्लभ संदेश पढ़ रहा था। मैं कभी कोठी को देखता, तो कभी गेट को। लेकिन, फिर यह सोचकर कि शहरों में ऐसा हो भी सकता है, आगे बढ़ गया।




कुछ कदम ही आगे बढ़ा था कि एक और कोठी के गेट पर लगे बोर्ड ने फिर मेरे कदम ठिठका दिए। साथ ही मेरा आश्चर्य भी बढ़ गया। लिखा था, "कुत्ते से सावधान!" थोडा़ और आगे चला तो एक और गेट पर लिखा मिला "अंदर कुत्ता है, बिना परिचय के गेट न खोलें"। मुझे यह तो इल्म था कि शहरों में कुत्ते अच्छे-खासे रसूखदार होते हैं, लेकिन इन सूक्त वाक्यों को पढ़कर तो ऐसा लगने लगा, मानो कुत्तों के आगे इन्सान की कोई औकात ही नहीं है। मैं सोच रहा था कि "बिना परिचय के गेट न खोलें" का मतलब कहीं यह तो नहीं कि गेट खोलने वाला कुत्ते का परिचित होना चाहिए।

मुझे याद आने लगा अपना गांव, जहां हर घर की चौखट के ऊपर लिखा रहता था "सुस्वागतम"। आज भी गांवों में "सुस्वागतम" की यह परंपरा खत्म नहीं हुई है। कुत्तों को लोग गांव में भी पालते हैं, लेकिन उनका दर्जा इन्सान से ऊपर नहीं रहता। लेकिन, यहां तो तस्वीर ही उलटी है। लोग इन्सान से ज्यादा कुत्तों की संगत में रहना पसंद करते हैं। खासकर, ऊंची सोसायटी में तो ऐसी रिस्पेक्ट नाते-रिश्तों की भी नहीं होती, जैसी कि कुत्ते की।

अब तो मुझे भी यह सब देख आश्चर्य नहीं होता, लेकिन 30-35 साल पहले की बात ही कुछ और है। तब हम आगे जरूर बढ़ रहे थे, लेकिन इतने नहीं, जितने कि आज बढ़ गए हैं। तब रिश्तों में बनावट नहीं थी, संबंधों की अहमियत थी। मुहल्ले मकानों के समूह नहीं, परिवार हुआ करते थे। कुत्ते लोग तब भी पालते थे, लेकिन उन कुत्तों की समाज के प्रति एक सोच थी। वो पूरे मुहल्ले को पहचानते थे, इसलिए गेट पर उनके नाम की तख्ती लटकाने की जरूरत नहीं पड़ती थी। ऐसा भी कह सकते हैं कि तब कुत्तों की वैरायटी चेंज नहीं हुई थी यानी वे इन्सान नहीं बने थे।

अब तो चाहरदीवारी में कैद रहने वाला हर कुत्ता इन्सान बन बैठा है। उसके महीने का खर्च इतना है, जितने में चार व्यक्तियों का एक सामान्य परिवार गुजर कर ले। खैर! तब से लेकर अब तक एक लंबा अर्सा बीत चुका है। इस कालखंड में पाश ही नहीं आम कालोनियों पर भी श्वान संस्कृति पूरी तरह हावी हो गई। हां! यह जरूर है कि आम कालोनियों के कुत्ते पाश कालोनियों के कुत्तों जैसा रुतबा हासिल नहीं कर पाए, लेकिन अपने घरों में तो राज इन्हीं कुत्तों का है। इतना ही नहीं, कुत्तों ने लोगों की जीवनचर्या भी पूरी तरह बदलकर रख दी है।

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* इन्सान को कुत्ता बनने की शुभकामनाएं

* कुत्ते से ज्यादा खतरनाक है कुत्ता होना

सुबह नौ-नौ, दस-दस बजे बिस्तर छोड़ने वाला व्यक्ति भी बिना अलार्म के ब्रह्ममुहूर्त में जाग जाता है। कुत्ते को नित्य क्रियाओं से निवृत्त जो कराना है। यह अलग बात है इस व्यस्तता के बीच उसे कई बार तो खुद के नहाने का भी वक्त नहीं मिल पाता। वह बच्चों की पढा़ई-लिखाई का भले ही ध्यान न रख पाए, लेकिन "डाग शो" के लिए कुत्ते को अपडेट रखना उसकी नैतिक जिम्मेदारी है। नाक का सवाल जो है, शो में कुत्ते से जरा भी ऊंच-नीच हो गई तो सोसायटी में नजरें मिलाना मुश्किल हो जाएगा। लोग मजाक उडा़एंगे कि, देखो! फलाने के कुत्ते में इतनी भी तहजीब नहीं है।




आपको मेरी ये तमाम बातें मजाक लग सकती हैं। आप यह भी कह सकते हो कि खाली दिमाग शैतान का घर। पर मितरों! यकीन जानिए कि सांस्कृतिक उन्नयन के इस दौर में वह कुत्ता ही है, जिसने हमें समाज में नजरें मिलाने का हौसला दिया है। आप घर में एक लाख रुपये कीमत की गाय पाल लीजिए। आपकी हैसियत ग्वाले की ही रहेगी। चाहे आप दूध बेचकर हजारों क्यों न कमा रहे हों। लेकिन, अगर आपने घर में पांच-दस हजार रुपये कीमत का भी कुत्ता पाल लिया तो समझ लीजिए आप शहंशाह हो गए।

कहने का मतलब आपको रसूख की जिंदगी जीनी है तो जैसे भी हो, एक कुत्ता पाल लीजिए। फिर भला वह लेंडी यानी स्लम डाग ही क्यों न हो। उसके लिए पेट काटना पडे़ तो काटिए। हफ्ते-दस दिन में व्रत-उपवास रखना पडे़ तो रखिए। लेकिन, मेहरबानी कर कुत्ता जरूर पालिए। अपनी संस्कृति को बचाने के लिए इतनी कुर्बानी तो आपको देनी ही पडे़गी।


Friday, 11 September 2026

12-09-2026 (प्रकृति की खूबसूरत वादियों में करें पैठाणी के राहु मंदिर की सैर)

पैठाणी कस्बे का मनमोहक नजारा












उत्तर भारत का इकलौता मंदिर, जहां भगवान शिव के साथ होती है राहु की पूजा कोटद्वार से 142 और जिला मुख्यालय पौड़ी से 45 किमी की दूरी पर है पैठाणी

प्रकृति की खूबसूरत वादियों में करें पैठाणी के राहु मंदिर की सैर
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दिनेश कुकरेती
चलिए! आपको उत्तराखंड के एक ऐसे अद्भुत मंदिर की सैर कराएं, जहां असुर कहे जाने वाले छाया ग्रह राहु की पूजा होती है। पौड़ी जिले के थलीसैण ब्लाक की कंडारस्यूं पट्टी के पैठाणी गांव में स्योलीगाड व नावालिका नदी के संगम पर स्थित यह मंदिर अपने अनुपम वास्तु के लिए प्रसिद्ध है। यह उत्तराखंड का इकलौता मंदिर है, जहां भगवान शिव के साथ राहु की पूजा होती है। कहते हैं कि आदि शंकराचार्य ने अपनी हिमालय यात्रा के दौरान पैठाणी में राहु मंदिर का निर्माण करवाया था। पर्वतीय अंचल में स्थित यह मंदिर बेहद भव्य एवं खूबसूरत है। यहां आयोजित होने वाले भंडारे में श्रद्धालु मूंग की खिचड़ी को प्रसाद रूप में ग्रहण करते हैं।

पौड़ी जिले के पैठाणी कस्बे में स्थित ऐतिहासिक राहु मंदिर



‘राष्ट्रकूट’ से बना राठ, ‘पैठीनसि’ से पैठाणी
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‘स्कंद पुराण’ के केदारखंड में उल्लेख है कि राष्ट्रकूट पर्वत की तलहटी में स्योलीगाड व नावालिका नदी के संगम पर राहु ने भगवान शिव का घोर तप किया, जिस वजह से यहां राहु मंदिर की स्थापना हुई। राष्ट्रकूट पर्वत के नाम पर ही यह राठ क्षेत्र कहलाया और राहु के गोत्र ‘पैठीनसि’ के कारण इस गांव का नाम पैठाणी पड़ा।

पहाड़ की गोद में स्थित पैठाणी कस्बे का मनमोहक नजारा



आठवीं-नवीं सदी के बीच का है मंदिर
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वास्तु शिल्प एवं प्रतिमाओं की शैली के आधार पर पैठाणी का यह शिव मंदिर और प्रतिमाएं आठवीं-नवीं सदी के बीच के प्रतीत होते हैं। मंदिर की ऊपरी शिखा कुछ झुकी हुई प्रतीत होती है। गर्भगृह में भगवान शिव के साथ राहु की धड़विहीन मूर्ति विराजमान है और दीवारों के पत्थरों पर आकर्षक नक्काशी की गई है, जिनमें राहु के कटे सिर व सुदर्शन चक्र उत्कीर्ण हैं। मंदिर भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के संरक्षण में है।
हरियाली से लकदक पौड़ी जिले का पैठाणी कस्बा



पश्चिमाभिमुखी मंदिर
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पत्थरों के ऊंचे चबूतरे पर बने मुख्य मंदिर के चारों कोनों में छोटे शिखर बने हैं। पश्चिम की ओर मुख वाले मुख्य मंदिर में वर्गाकार गर्भगृह के सामने मंडप बनाया गया है। उत्तर-पूर्वी व दक्षिण कर्ण प्रासादों की चंद्रालाओं (हवा-रोशनी के लिए बनी जालीदार सजावटी आकृतियां) के मध्य पत्थरों पर नक्काशी की गई है।

पौड़ी जिले के पैठाणी में स्थित उत्तर भारत का एकमात्र राहु मंदिर



इन स्थलों की भी कर सकते हैं सैर
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पैठाणी से 50 किमी की दूरी पर थलीसैंण कस्बे की खूबसूरती भी देखने लायक है। यहां आप लोक संस्कृति के ठेठ पारंपरिक स्वरूप से परिचित हो सकते हैं। आप ऋषिकेश से पौड़ी होकर पैठाणी जा रहे हैं तो एक दिन रुककर पर्यटन नगरी पौड़ी की सुंदरता को अवश्य निहारें। इसी के साथ कोटद्वार-पौड़ी हाईवे पर स्वतंत्रता आंदोलन का गवाह रहा ऐतिहासिक नगर दुगड्डा व पहाड़ का जंक्शन सतपुली नगर भी आपका मन मोह लेगा। पौड़ी से 20 किमी दूर स्थित खिर्सू जैसे खूबसूरत पर्यटन स्थल के लिए भी वक्त निकाल लें तो सोने पे सुहागा।

हरी-भरी पहाड़ियों के बीच बसा खूबसूरत थलीसैंण नगर





ऐसे पहुंचें पैठाणी
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पैठाणी के लिए गढ़वाल के प्रवेशद्वार कोटद्वार से 142 किमी अथवा जिला मुख्यालय पौड़ी से 45 किमी की दूरी तय करनी पड़ती है। कोटद्वार से पौड़ी की दूरी 102 और ऋषिकेश से 113 किमी है। पौड़ी से ही पैठाणी का सफर शुरू होता है। दिल्ली समेत देश के अन्य स्थानों से ऋषिकेश व कोटद्वार तक रेल और जौलीग्रांट स्थित देहरादून एयरपोर्ट तक हवाई सुविधा उपलब्ध है। 

गढ़वाल के जंक्शन सतपुली नगर का खूबसूरत नजारा



खाने-ठहरने के पर्याप्त इंतजाम
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पैठाणी के लिए पौड़ी व कोटद्वार से सार्वजनिक वाहन सुविधा उपलब्ध है। आप यहां वर्षाकाल को छोड़कर कभी भी जा सकते हैं। पैठाणी के साथ ही रास्तेभर के हर पड़ाव पर खाने-ठहरने के पर्याप्त इंतजाम हैं। होमस्टे में आप पारंपरिक व्यजनों का लुत्फ भी ले सकते हैं।
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North India's only temple where Rahu is worshipped alongside Lord Shiva; Paithani is located 142 km from Kotdwar and 45 km from the district headquarters, Pauri.

Explore the Rahu Temple in Paithani Amidst the Beautiful Valleys of Nature

By Dinesh Kukreti
Let’s take you on a journey to a wonderful temple in Uttarakhand where Rahu, the shadow planet often called a demon, is worshipped. Located at the confluence of the Syoligaad and Nawalika rivers in Paithani village, situated in the Kandarsyun Patti of Thalisain block in Pauri district, this temple is famous for its unique architecture. It is the only temple in Uttarakhand where Rahu is worshipped alongside Lord Shiva. It is said that Adi Shankaracharya built the Rahu temple in Paithani during his Himalayan journey. Located in the mountainous region, this temple is extremely grand and beautiful. In the bhandara (community feast) organized here, devotees receive Moong Dal Khichdi as prasad (sacred offering).

From 'Rashtrakuta' to Rath, from 'Paithinasi' to Paithani

The Kedarkhand of Skanda Purana mentions that Rahu performed severe penance to please Lord Shiva at the foothills of the Rashtrakuta mountain, right at the confluence of the Syoligaad and Nawalika rivers. This led to the establishment of the Rahu temple here. The region came to be known as 'Rath' after the Rashtrakuta mountain, and the village was named 'Paithani' after Rahu's clan (gotra) 'Paithinasi'.

The Temple Dates Back Between the 8th and 9th Century

Based on the architectural style and the sculptures, this Shiva temple and the idols of Paithani appear to belong to the 8th-9th century. The upper spire (shikhara) of the temple appears slightly leaning. Inside the sanctum sanctorum (garbhagriha), a headless idol of Rahu sits alongside Lord Shiva. The stones of the walls feature attractive carvings depicting the severed head of Rahu and the Sudarshan Chakra. The temple is under the protection of the Archaeological Survey of India (ASI).
सतपुली में नयार नदी पर बन रही कृत्रिम झील

A West-Facing Temple

Built on a high stone platform, the main temple features smaller spires at all four corners. The main temple faces west and has a pavilion (mandap) built in front of a square sanctum sanctorum. Intricate stone carvings adorn the spaces between the chandralas (decorative latticed shapes meant for air and light) of the north-eastern and southern corner shrines (karna prasadas).

Other Places You Can Explore

Located 50 km from Paithani, the beauty of Thalisain town is also worth seeing. Here, you can experience the raw, traditional essence of local folk culture. If you are travelling from Rishikesh to Paithani via Pauri, you must stay a day to admire the beauty of the tourist town of Pauri. Along with this, the historical town of Dugadda on the Kotdwar-Pauri highway, which witnessed the freedom movement, and Satpuli, the junction town of the hills, will win your heart. It would be the icing on the cake if you could also make time for Khirsu, a beautiful tourist spot located 20 km from Pauri.

How to Reach Paithani

To reach Paithani, you have to travel a distance of 142 km from Kotdwar (the gateway to Garhwal) or 45 km from the district headquarters, Pauri. The distance from Kotdwar to Pauri is 102 km, and from Rishikesh to Pauri is 113 km. The actual journey to Paithani begins from Pauri. Train connectivity is available up to Rishikesh and Kotdwar from Delhi and other parts of the country, while air connectivity is available up to Jolly Grant Airport in Dehradun.

Ample Arrangements for Food and Stay

Public transport options are easily available for Paithani from Pauri and Kotdwar. You can visit this place at any time of the year, except during the monsoon season. There are ample arrangements for food and lodging at Paithani as well as at every stop along the route. You can also enjoy traditional local cuisine at the homestays.


11-09-2026 (आइए! 'तिलिस्मी ट्रेक' ड्याली सेरा की सैर करें)







चमोली जिले के ज्योतिर्मठ विकासखंड में 11,808 से 12,267 फीट तक की ऊंचाई पर स्थित है ड्याली सेरा बुग्याल, धान के खेत हैं इस बुग्याल का खास आकर्षण
आइए! 'तिलिस्मी ट्रेक' ड्याली सेरा की सैर करें
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दिनेश कुकरेती
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त्तराखंड में ऐसे कई अनछुए पर्यटन स्थल और ट्रेक रूट हैं, जिन पर आज तक देश-दुनिया के पर्यटकों की नजर नहीं पड़ी। जबकि, ये स्थल इतने खूबसूरत हैं कि एक बार जाने के बाद बार-बार इनकी सैर को मन करता है। इन्हीं में एक है चमोली जिले के ज्योतिर्मठ विकासखंड में स्थित ड्याली सेरा ट्रेक (Dyalishera Trek), जिसे उत्तराखंड पर्यटन विकास परिषद (यूटीडीबी) ने ‘ट्रेक ऑफ द ईयर 2026’ घोषित किया है। उत्तराखंड हिमालय के गढ़वाल क्षेत्र में 11,808 से 12,267 फीट तक की ऊंचाई पर प्रसिद्ध कुंवारी पास और पंगारचूल्हा पीक रूट के पास पड़ने वाला यह ट्रेक लगभग 22 किमी लंबा है। अपनी रहस्यमयी खूबसूरती के कारण इसे 'तिलिस्मी ट्रेक' के नाम से भी जाना जाता है। इस ट्रेक पर ड्याली बुग्याल (अल्पाइन घास का मैदान), घने जंगल, खूबसूरत घाटियां, धान के खेत और हनुमान ताल आकर्षण का मुख्य केंद्र हैं।



ड्याली सेरा में एक सितंबर 'ट्रेक ऑफ द ईयर-2026' के तहत विशेष ट्रैकिंग अभियान शुरू हो चुका है, जो कि 30 मार्च 2027 तक चलेगा । इसके तहत पहले आने वाले 300 ट्रेकर्स को प्रति व्यक्ति ₹2,000 की सब्सिडी दी जा रही है। यह सब्सिडी पर्यटन विभाग में पंजीकृत स्थानीय टूर ऑपरेटरों के माध्यम से 'पहले आओ, पहले पाओ' के आधार पर मिल रही है। ड्याली सेरा को पर्यटन मानचित्र पर लाने से स्थानीय युवाओं और ग्रामीणों के लिए रोजगार एवं स्वरोजगार के नए अवसर पैदा होंगे। इस नए ट्रेकिंग रूट के विकसित होने से पहले से अत्यधिक व्यस्त रहने वाले कुंवारी पास ट्रेक पर मानवीय दबाव को कम करने में भी मदद मिलेगी।



मन मोह लेता है ड्याली बुग्याल
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इस ट्रेक का सबसे खूबसूरत पड़ाव है ड्याली बुग्याल (Alpine Meadows)। जब आप पेड़ों की कतार (Tree Line) को पार करते हैं तो मखमली हरी घास के विशाल मैदान आपका स्वागत करते हैं। सर्दियों में ये मैदान पूरी तरह बर्फ की सफेद चादर ओढ़ लेते हैं। यहां से नंदा देवी, द्रोणागिरी, हाथी-घोड़ा पर्वत और चौखंभा जैसी प्रसिद्ध पर्वत चोटियों के भव्य एवं स्पष्ट दर्शन होते हैं।


जैव विविधता के दर्शन
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इस ट्रेक पर घने जंगल और जैव विविधता के दर्शन होते हैं। यह मार्ग ओक (Oak) और बुरांश (Rhododendron) के घने जंगल से होकर गुजरता है। ट्रेक पर आप हिमालयन थार और उत्तराखंड के राज्य पक्षी मोनाल का भी आसानी से दीदार कर सकते हैं।

आध्यात्मिक अनुभूति कराता है हनुमान ताल
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ड्याली सेरा से पहले रास्ते में पवित्र हनुमान ताल पड़ता है। घने जंगल, मखमली घास के मैदान (बुग्याल) और पंगारचूल्हा (Pangarchulla) व कुंवारी पास (Kuari Pass) क्षेत्र से घिरा यह एक शांत एवं पवित्र उच्च पर्वतीय ताल है, जो इसके आध्यात्मिक महत्व को बढ़ाता है। हनुमान ताल के किनारे कैंपिंग करना और सुबह के समय इसकी शांति को महसूस करना किसी आध्यात्मिक अनुभव से कम नहीं है।


अनोखा 'डिंगा सेरा' और भूम्याल देवता
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ग्रामीणों की मान्यता है कि प्राचीन काल में इस ऊंचाई पर स्वयं देवता धान की खेती करते थे। सेरा का अर्थ धान का खेत होता है। सेरे के पास ही भूम्याल देवता (क्षेत्रपाल) का मंदिर है, जहां क्षेत्र के लोग आज भी प्रकृति की रक्षा के लिए विशेष पूजा करते हैं।

नए ट्रेकर्स और अनुभवी लोगों के लिए सबसे उपयुक्त
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आसान से मध्यम (Easy-Moderate) श्रेणी का 22 से 25 किमी (आना-जाना) लंबा यह ट्रेक नए ट्रेकर्स (Fit Beginners) और अनुभवी लोगों, दोनों के लिए उपयुक्त है। ट्रेक की अवधि (Duration) पांच दिन और चार रातें (ऋषिकेश-हरिद्वार से शुरू और समाप्त) है। ट्रेकिंग का सबसे अच्छा समय अप्रैल से जुलाई और सितंबर से दिसंबर के बीच का है।

पर्याप्त गर्म कपड़े और जरूरी दवाएं अवश्य साथ रखें
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यह एक उच्च पर्वतीय ट्रेक है। सर्दियों के अभियान (दिसंबर से मार्च) के दौरान यहां का तापमान काफी गिर जाता है। इस अवधि में आने वाले ट्रेकर्स कम से कम तीन से चार लेयर वाले गर्म कपड़े (थर्मल इनर, फ्लीस जैकेट, डाउन जैकेट), अच्छी ग्रिप वाले और वाटरप्रूफ ट्रेकिंग शूज, ट्रेकिंग पोल (Trekking Pole), हेडलैंप या टॉर्च, यूवी प्रोटेक्टेड सनग्लासेस और ऊंचाई पर होने वाली बीमारी (Acute Mountain Sickness - AMS) के लिए जरूरी दवाएं अवश्य साथ रखें।



ऐसे पहुंचें
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ड्याली सेरा की ट्रेकिंग के लिए हरिद्वार या ऋषिकेश से ज्योतिर्मठ पहुंचना पड़ता है। यहां से 16 किमी दूर कारछो गांव पड़ता है, जो सड़क से जुड़ा हुआ है। यहां पर्याप्त संख्या में होटल व होमस्टे उपलब्ध हैं। कारछो से ही यह ट्रेक शुरू होता है, जहां से डोबरिया कैंप (Dobriya Camp) छह किमी दूर पड़ता है। डोबरिया कैंप से ड्याली सेरा समिट (Dyalishera Summit) और वापसी ट्रेक दूरी आठ किमी है। फिर नीचे की ओर डोबरिया से कारछो लौटते हुए आठ से दस किमी की दूरी तय करनी पड़ती है। इसके बाद ट्रेकर्स ज्योतिर्मठ लौटकर ऋषिकेश या हरिद्वार के लिए विदाई लेते हैं। कुछ एडवेंचर ऑपरेटर इस ट्रेक को थोड़ा और आगे बढ़ाकर इसके पास स्थित प्रसिद्ध पंगार चूल्हा पीक (Pangarchulla Peak) के साथ जोड़कर छह दिन का कंबाइंड ट्रेक भी कराते हैं।
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Dyalishera Bugyal is situated at an altitude of 11,808 to 12,267 feet in the Jyotirmath development block of Chamoli district. The paddy fields are the main attraction of this meadow (Bugyal).

Come, Let’s Explore the 'Mystical Trek' of Dyalishera!

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By Dinesh Kukreti
Uttarakhand is home to many such untouched tourist destinations and trek routes that have not yet caught the eye of domestic and international tourists. However, these places are so beautiful that once you visit them, you feel like going back again and again. One such destination is the Dyalishera Trek, located in the Jyotirmath development block of Chamoli district, which has been declared the ‘Trek of the Year 2026’ by the Uttarakhand Tourism Development Board (UTDB). Situated in the Garhwal region of the Uttarakhand Himalayas at an altitude ranging from 11,808 to 12,267 feet, this approximately 22 km long trek lies near the famous Kuari Pass and Pangarchulla Peak route. Due to its mysterious beauty, it is also known as the 'Mystical Trek' (Talismi Trek). The main centers of attraction on this route are the Dyali Bugyal (alpine meadow), dense forests, beautiful valleys, paddy fields, and Hanuman Tal.
A special trekking expedition under the 'Trek of the Year 2026' commenced on September 1 and will continue until March 30, 2027. Under this initiative, a subsidy of ₹2,000 per person is being given to the first 300 trekkers. This subsidy is available on a 'first-come, first-served' basis through local tour operators registered with the tourism department. Bringing Dyalishera onto the tourism map will create new employment and self-employment opportunities for local youth and villagers. The development of this new trekking route will also help reduce human pressure on the already heavily congested Kuari Pass trek.

Dyali Bugyal Captivates the Heart

The most beautiful stop on this trek is Dyali Bugyal (Alpine Meadows). As you cross the tree line, vast fields of velvety green grass welcome you. In winter, these meadows cover themselves completely in a white blanket of snow. From here, one can get grand and clear views of famous mountain peaks like Nanda Devi, Dronagiri, Hathi-Ghoda Parvat, and Chaukhamba.

Witness to Rich Biodiversity

This trek offers a glimpse of dense forests and rich biodiversity. The trail passes through dense forests of Oak and Rhododendron (Buransh). On this trek, you can easily spot the Himalayan Thar and Uttarakhand’s state bird, the Monal.

Hanuman Tal: A Spiritual Experience

Before reaching Dyalishera, the sacred Hanuman Tal falls along the way. Surrounded by dense forests, velvety meadows (Bugyals), and the Pangarchulla and Kuari Pass regions, this is a serene and holy high-altitude lake that enhances its spiritual significance. Camping by the shores of Hanuman Tal and experiencing its tranquility in the morning is nothing short of a spiritual experience.

Unique 'Dinga Sera' and Bhumyal Devta

Villagers believe that in ancient times, the gods themselves used to cultivate paddy at this high altitude. 'Sera' translates to a paddy field. Near the Sera lies the temple of Bhumyal Devta (the local guardian deity), where the locals still perform special prayers to protect nature.

Best Suited for Novice and Experienced Trekkers Alike

Categorized as an easy-to-moderate level trek, this 22 to 25 km (round trip) long trail is suitable for both fit beginners and experienced trekkers. The duration of the trek is five days and four nights (starting and ending at Rishikesh/Haridwar). The best time for trekking is between April to July and September to December.

Essential Carry-Ons: Warm Clothes and Necessary Medicines

This is a high-altitude trek. During the winter expeditions (December to March), the temperature drops significantly. Trekkers visiting during this period must carry at least three to four layers of warm clothing (thermal inners, fleece jackets, down jackets), waterproof trekking shoes with a good grip, trekking poles, headlamps or flashlights, UV-protected sunglasses, and essential medicines for Acute Mountain Sickness (AMS).

How to Reach

To trek Dyalishera, one has to reach Jyotirmath from Haridwar or Rishikesh. Karchho village, which is well-connected by road, is located 16 km from here. A sufficient number of hotels and homestays are available here. The trek begins from Karchho, from where Dobriya Camp is 6 km away. The distance from Dobriya Camp to Dyalishera Summit and back is 8 km. Descending from Dobriya back to Karchho requires covering a distance of 8 to 10 km. After this, trekkers return to Jyotirmath and head back to Rishikesh or Haridwar. Some adventure operators extend this trek slightly to connect it with the nearby famous Pangarchulla Peak, offering a 6-day combined trek.


Friday, 21 August 2026

21-08-2026 (मातृभाषा के प्रति अनुराग रखते हो तो ये मौका हाथ से न जाने देना)


जनगणना परिपत्र के भाषा वाले कालम में अनिवार्य रूप से अपनी मातृभाषा (गढ़वाली, कुमौनी व जौनसारी) दर्ज कराएं। यह जानकारी आपकी व्यक्तिगत पहचान और सांस्कृतिक विविधता को दर्शाती है। जनगणना के दौरान आपकी मातृभाषा के बारे में जानकारी एकत्र की जाती, जिसका उपयोग सामाजिक और आर्थिक नीतियां बनाने में किया जाता है।




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मातृभाषा के प्रति अनुराग रखते हो तो ये मौका हाथ से न जाने देना
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दिनेश कुकरेती 
उत्तराखंड के 131 हिमाच्छादित (स्नो-बाउंड) गांवों और तीन शहरी क्षेत्रों में जनगणना-2027 के तहत 17 अगस्त से डिजिटल स्व-गणना (Self-Enumeration) की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है, जो कि 31 अगस्त तक चलेगी। इसके तहत इन दुर्गम क्षेत्रों के निवासी ऑनलाइन पोर्टल के माध्यम से खुद ही अपना विवरण दर्ज कर रहे हैं। इसके बाद एक सितंबर से 30 सितंबर तक प्रगणक (Enumerators) घर-घर जाकर इस डेटा का सत्यापन करेंगे। यह ऐसा मौका है, जब आप अपनी मातृभाषा गढ़वाली, कुमाऊंनी व जौनसारी को उचित सम्मान दिला सकते हैं। इसके लिए आपको सिर्फ गणना प्रपत्र के मातृभाषा वाले कॉलम में अपनी दुधबोली यानी गढ़वाली, कुमाऊंनी व जौनसारी को दर्ज करना है। यदि आप मातृभाषा के प्रति जरा भी अनुराग रखते हैं तो मुझे उम्मीद है कि ऐसा ही करेंगे।





फिलहाल यह स्व-गणना प्रदेश के चार प्रमुख सीमांत एवं उच्च हिमालयी जिलों उत्तरकाशी, पिथौरागढ़, चमोली व रुद्रप्रयाग में की जा रही है, जो लगभग 52,000 की आबादी को कवर करेगी। उत्तरकाशी में सबसे अधिक 69 हिमाच्छादित गांव और एक नगर पंचायत ( गंगोत्री), पिथौरागढ़ में 35 हिमाच्छादित गांव (मुख्य रूप से मुनस्यारी और धारचूला क्षेत्र), चमोली में 23 से 25 हिमाच्छादित राजस्व गांव (जैसे माणा, नीती, मलारी आदि) और एक नगर पंचायत ( बदरीनाथ) और रुद्रप्रयाग में चार हिमाच्छादित गांव और एक नगर पंचायत ( केदारनाथ) शामिल है। देश के बाकी हिस्सों में मुख्य जनसंख्या गणना (Population Enumeration) की प्रक्रिया अगले वर्ष नौ फरवरी से शुरू होकर 28 फरवरी तक चलेगी। इसके बाद एक से पांच मार्च तक छूटे हुए लोगों के लिए रिवीजन राउंड (जांच प्रक्रिया) चलाया जाएगा।



40 सवालों के देने हैं जवाब, इन्हीं में मातृभाषा से जुड़े अहम सवाल भी
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जनगणना-2027 के जनसंख्या गणना (Population Enumeration) चरण के लिए सरकार की ओर से जारी 40 प्रश्नों की सूची में भाषा और मातृभाषा से जुड़े महत्वपूर्ण सवाल शामिल हैं। इसके तहत प्रत्येक नागरिक से भाषा को लेकर मुख्य रूप से दो स्तरों (मातृभाषा और दूसरी अन्य भाषाएं) पर जानकारी मांगी जाएगी।

मातृभाषा (Mother Tongue): वह भाषा या स्थानीय बोली जो व्यक्ति बचपन से घर में बोलता आ रहा है।

अन्य भाषाएं (Other Known Languages): मातृभाषा के अलावा व्यक्ति अन्य कौन-सी दो भाषाएं या बोलियां बोल या समझ सकता है, उनकी प्रविष्टि की जा रही है।




कहने का मतलब जनगणना प्रपत्र में स्थानीय बोलियों यानी गढ़वाली, कुमाऊंनी, जौनसारी या अन्य सीमांत बोलियों को 'मातृभाषा' या 'अन्य भाषा' वाले कॉलम में दर्ज कराने का विकल्प है। इससे जहां भाषाई विविधता का संरक्षण होगा, वहीं भाषाओं को लेकर नीतियां तक करने में भी मदद मिलेगी। मसलन देश में किस क्षेत्र में कौन-सी बोली या उप-बोली विलुप्त होने के कगार पर है या कितनी आबादी द्वारा बोली जा रही है, इसका सटीक डेटा मिल सकेगा। साथ ही स्थानीय बोलियों और भाषाओं के आधार पर प्राथमिक शिक्षा (Primary Education) और स्थानीय स्तर पर सरकारी योजनाओं के प्रचार-प्रसार की नीतियां भी तय की जा सकेंगी। इसलिए आप सबसे विनम्र निवेदन है कि जनगणना प्रपत्र के मातृभाषा वाले कॉलम में याद करके गढ़वाली, कुमाऊंनी, जाैनसारी या अन्य सीमांत बोलियां दर्ज करें। लोकसंस्कृति के संरक्षण की यही प्रथम सीढ़ी है।



ऐसे करें ऑनलाइन स्व-गणना
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हिमाच्छादित गांवों के लोग स्व-गणना पोर्टल https://se-snowbound.census.gov.in के माध्यम से ऑनलाइन स्व-गणना कर सकते हैं। इसके लिए पोर्टल पर जाकर लगभग 40 आसान प्रश्नों की जानकारी स्वयं दर्ज करनी होगी। स्व-गणना की प्रक्रिया पूरी होने के बाद प्राप्त कोड नंबर को सुरक्षित रखना आवश्यक है। एक सितंबर से 30 सितंबर के बीच जब प्रगणक घर-घर पहुंचेंगे, तब यह कोड नंबर प्रगणक को उपलब्ध कराया जा सकता है, जिससे जनगणना प्रक्रिया को सुगम एवं त्वरित रूप से पूर्ण करने में मदद मिलेगी।

विदित हो कि जनगणना-2027 के प्रथम चरण में स्व-गणना पोर्टल के माध्यम से मकान सूचीकरण एवं मकानों की स्व-गणना की प्रक्रिया 10 अप्रैल से 24 अप्रैल के बीच पूरी की जा चुकी है। इसके बाद 25 अप्रैल से 24 मई तक प्रगणकों ने हाउस लिस्टिंग का कार्य किया था।
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Make sure to mandatorily mention your mother tongue (Garhwali, Kumaoni, or Jaunsari) in the language column of the Census form. This information reflects your individual identity and cultural diversity. During the Census, information about your mother tongue is collected and used in formulating social and economic policies.

If you have affection for your mother tongue, don’t let this opportunity slip away
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Dinesh Kukreti
Under Census-2027, the process of Digital Self-Enumeration has already begun from August 17 in 131 snow-bound villages and three urban areas of Uttarakhand. It will continue until August 31. Residents of these remote areas are entering their details themselves through the online portal. Subsequently, from September 1 to September 30, enumerators will visit households to verify the data.

This is an opportunity for you to ensure that your mother tongues—Garhwali, Kumaoni, and Jaunsari—receive due recognition and respect. All you need to do is enter your own mother tongue, or dudhbolee (the language spoken at home), such as Garhwali, Kumaoni, or Jaunsari, in the mother-tongue column of the census form. If you have even the slightest affection for your mother tongue, I hope you will do exactly that.

At present, this self-enumeration exercise is being conducted in four major border and high-Himalayan districts of the state—Uttarkashi, Pithoragarh, Chamoli, and Rudraprayag—and will cover a population of approximately 52,000.

Uttarkashi has the largest number, with 69 snow-bound villages and one Nagar Panchayat (Gangotri). Pithoragarh has 35 snow-bound villages, mainly in the Munsiyari and Dharchula areas. Chamoli has 23 to 25 snow-bound revenue villages, including Mana, Niti, and Malari, along with one Nagar Panchayat (Badrinath). Rudraprayag has four snow-bound villages and one Nagar Panchayat (Kedarnath).

In the rest of the country, the Population Enumeration process will begin next year on February 9 and continue until February 28. A Revision Round will then be conducted from March 1 to March 5 for people who may have been missed.

40 Questions to Be Answered, Including Important Questions on Mother Tongue
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For the Population Enumeration phase of Census-2027, the government has issued a list of 40 questions, including important questions related to language and mother tongue. Every citizen will primarily be asked for information at two levels: mother tongue and other languages known.

Mother Tongue: The language or local dialect that a person has been speaking at home since childhood.

Other Known Languages: Apart from their mother tongue, respondents will be asked to provide information about up to two other languages or dialects that they can speak or understand.

In other words, the census form provides an option to record local dialects such as Garhwali, Kumaoni, Jaunsari, or other border-region dialects under the “Mother Tongue” or “Other Language” columns.

This will not only help preserve linguistic diversity but will also assist in formulating language-related policies. For instance, accurate data can be obtained on which dialects or sub-dialects in different parts of the country are on the verge of extinction and how many people speak them.

Such data can also help shape policies related to primary education and the dissemination of government schemes at the local level based on local languages and dialects.

Therefore, I humbly request you to remember to enter Garhwali, Kumaoni, Jaunsari, or other border-region dialects in the mother-tongue column of the census form, as applicable. This is the first step toward preserving our folk culture.

How to Complete Online Self-Enumeration
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Residents of snow-bound villages can complete their self-enumeration online through the Self-Enumeration Portal: https://se-snowbound.census.gov.in After visiting the portal, they need to enter information themselves in response to approximately 40 simple questions. Once the self-enumeration process is completed, it is important to keep the code number received safely.

When enumerators visit households between September 1 and September 30, the code number can be provided to them. This will help make the census process smoother and quicker.

It may be noted that, during the first phase of Census-2027, the process of House Listing and self-enumeration of houses through the Self-Enumeration Portal was completed between April 10 and April 24. Subsequently, from April 25 to May 24, enumerators carried out the house-listing exercise.

29-09-2026 (अपनी मातृभाषा को दिलाएं उसका सही एवं गौरवपूर्ण स्थान)

अपनी मातृभाषा को दिलाएं उसका सही एवं गौरवपूर्ण स्थान --------------------------------------------------- ----------- आप चाहते हैं कि हमारी म...