Friday, 3 April 2026

03-04-2026 (तन-मन में स्फूर्ति भर गईं ओडिशा की अविस्मरणीय अनुभूतियां)


google.com, pub-1212002365839162, DIRECT, f08c47fec0942fa0

तन-मन में स्फूर्ति भर गईं ओडिशा की अविस्मरणीय अनुभूतियां

--------------------------------------------------------------
दिनेश कुकरेती
यात्रा कोई भी हो, वह जीवन में ताजगी भर देती है। यात्रा हमें संबंधित क्षेत्र के भूगोल से ही नहीं जोड़ती, बल्कि उसके इतिहास से परिचित कराने के साथ भविष्य की राह भी सुझाती है। यात्रा संस्कृति भी है और संस्कार भी। इसलिए मैं यात्रा को सैर-सपाटे से ज्यादा जीवन की पाठशाला के रूप में देखता हूं। मैं जब भी यात्रा करता हूं तो मेरा मन भी यात्री बन जाता है। वह मुझे थकन का एहसास नहीं होने देता, बल्कि पथ-प्रदर्शक बनकर मेरे आनंद को द्विगुणित कर देता है और मैं कई-कई दिन तक उसमें डूबा रहता हूं। अब देखिए, ओडिशा का छोटा-सा हेरिटेज गांव रघुराजपुर मेरे अंतर्मन में इस कदर समा चुका है कि वहां के लोग, उनका अपनी लोक विरासत के प्रति समर्पण और भविष्य की पीढ़ी को परंपरा से जोड़ने की ललक इन दिनों मेरे सपनों की विषय-वस्तु बनी हुई है। जागते हुए भी उनके पट्टाचित्र मेरी आंखों में तैरने लगते हैं।




पारंपरिक स्वागत से पलभर में काफूर हुई दिनभर की थकान
-------------------------------------------------------------
ओडिशा के पुरी जनपद में स्थित रघुराजपुर गांव को देश के पहले हेरिटेज क्राफ्ट विलेज का दर्जा हासिल है। इस गांव के भ्रमण का सौभाग्य मुझे पीआईबी देहरादून के सहयोग से मिला। दरअसल सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय की ओर से उत्तराखंड के 13 सदस्यीय मीडिया अध्ययन दाल को 22 से 25 मार्च तक ओडिशा का भ्रमण कराया गया। दल नायक थे पीआईबी देहरादून के सहायक निदेशक संजीव सुन्द्रियाल। सरल, सौम्य एवं बेहद आत्मीय इंसान हैं संजीव भाई। जाहिर है उनके साथ इस दौरे को यादगार होना ही था। हम 22 मार्च को सुबह 9:35 बजे इंडिगो की फ्लाइट से दिल्ली के लिए रवाना हुए। वहां से भुवनेश्वर की फ्लाइट शाम 4:30 बजे की थी, लेकिन उसमें विलंब होने के कारण हम भुवनेश्वर के लिए प्रस्थान कर पाए शाम 6:30 बजे। खैर! 8:30 बजे के आसपास हम वहां पहुंचे। थकान काफी थी, जो होटल ग्रीन पैलेस में हुए पारंपरिक स्वागत से पलभर में काफूर हो गई। कुछ देर में हमने भोजन किया और फिर अपने-अपने रूम की ओर चल पड़े।
कोणार्क का प्रसिद्ध सूर्य मंदिर



कोणार्क सूर्य मंदिर का अनूठा सम्मोहन
-------------------------------------------------------------
हमारा शेड्यूल काफी भारी-भरकम था, जिसकी शुरुआत 23 मार्च की सुबह ऐतिहासिक भुवनेश्वर शहर की अर्द्ध परिक्रमा करने के बाद कोणार्क मंदिर की ओर प्रस्थान के साथ हुई। इस मंदिर को वर्ष 1984 में यूनेस्को की वर्ल्ड हेरिटेज साइट में शामिल किया गया है। 13वीं सदी (1250 ईस्वी) में चंद्रभागा नदी के मुहाने पर पूर्वी गंगा वंश के राजा नरसिंह देव प्रथम का बनाया यह मंदिर सूर्य को समर्पित है। 865 फ़ीट लंबे और 540 फ़ीट चौड़े क्षेत्रफल में पारंपरिक कलिंगा शैली में निर्मित मंदिर को इस तरह से डिजायन किया गया है कि सूर्य की पहली किरणें उसी पर पड़ें। इस अनूठे डिजायन में 12 जोड़े बहुत ही सुंदर पत्थर के पहिये और सात घोड़े शामिल हैं, जो सूर्य के आकाश गमन को दर्शाते हैं। मंदिर के गहरे रंग के कारण इसे काला पैगोडा (पगोडा) भी कहा जाता है। मेरे लिए मंदिर को करीब से देखने का यह पहला मौका था, इसलिए मेरी खुशी का कोई पारावार न था। जैसे-तैसे मैं खुद को संयत करने का प्रयास कर रहा था, पर समय की अपनी पाबंदियां हैं और हमें अगले पड़ाव की ओर भी बढ़ना था, इसलिये सारी उत्कंठा और खुशियों को अपने अंतर्मन में समेटकर सूर्य की इस पावन भूमि से विदाई ली।
हेरिटेज क्राफ्ट विलेज रघुराजपुर

मैंने पहली बार देखा परम्पराओं को सहेजने वाला ऐसा गांव
-------------------------------------------------------------
हमारा अगला पड़ाव था रघुराजपुर गांव। पुरी शहर के केंद्र से लगभग 12 किमी की दूरी पर स्थित इस गांव की पहचान देश के पहले हेरिटेज क्राफ्ट विलेज के रूप में है। गांव के मध्य में 12 मंदिर हैं, जिनके दोनों ऒर एक पंक्ति में लगभग 160 घर हैं। हालांकि, गांव में हमें बहुत वक़्त गुजारने का मौका नहीं मिला, लेकिन अल्प समय में ही उसने मुझे तो अपना बना लिया। गांव क्या है, मानो कला की प्रयोगशाला हो। आप इसे ओपन एयर आर्ट गैलरी भी कह सकते हैं। घरों की दीवारें म्यूरल्स से सजी हैं और हर चौखट पर कल्पनाएं मिट्टी, पत्थर, लकड़ी, नारियल की खोपड़ी, सुपारी, कांच की बोतल, सूती-रेशमी वस्त्र व कागज पर आकार ले रही हैं। सीधे- सच्चे लोग। कोई आडंबर नहीं, न कलाकार होने का कोई अहंकार ही। अपनेपन से मिलते हैं और अपनेपन से ही बात भी करते हैं। देश के विभिन्न हिस्सों से ही नहीं, विदेश से भी लोग उनसे पट्टाचित्र कला (ताड़ के पत्तों पर चित्रकारी) की बारीकियां सीखने आते हैं। मैंने इन जैसे गुरु भी आज तक कहीं नहीं देखे।
पट्टाचित्र कला


कला के प्रति समर्पण, संस्कृति का संरक्षण
-------------------------------------------------------------
रघुराजपुर की पट्टाचित्र कला पुरी की संस्कृति को स्वयं में समेटे हुए है। जब पुरी के जगन्नाथ मंदिर में त्रिमूर्ति का सिंहासन रिक्त रहता है, तब सुनहरे रंग में रंगे रघुराजपुर के पट्टाचित्रों को ही पूजा जाता है। ऐसा तब होता है, जब भगवान जगन्नाथ जलभरे 108 घड़ों से स्नान के लिए स्नान मंडप में जाते हैं या फिर रुग्ण हो जाते हैं। इस गांव के कलाकारों की अनेक पीढ़ियां इस आनुष्ठानिक चित्रकला शैली की चित्रकारी करती आ रही हैं। मैं दावे के साथ कह सकता हूं कि कला के प्रति ऐसा समर्पण शायद ही कहीं और देखने को मिलेगा।
समुद्र तट से लगा काजू का जंगल



चंद्रभागा समुद्र तट से गुजरते हुए
-------------------------------------------------------------
...और हां! इस यात्रा की महत्वपूर्ण कड़ी को पिरोना तो मैं भूल ही गया था। यह कड़ी कोणार्क सूर्य मंदिर को चंद्रभागा समुद्र तट होते हुए रघुराजपुर गांव को जोड़ती है। पुरी-कोर्णाक मरीन ड्राइव पर स्थित चंद्रभागा सी बीच कोर्णाक सूर्य मंदिर से महज तीन किमी के फासले पर है। देश में यह एकमात्र ऐसा समुद्र तट है, जिसे विश्व पर्यावरण दिवस पर ब्लू फ्लैग सर्टिफिकेशन मिला हुआ है। पुरी से इसकी दूरी 33 किमी और भुवनेश्वर से 65 किमी है। इस पूरे मार्ग के दोनों ओर पसरा घना जंगल मन को मोह लेता है। जब हमारे चालक कान्हा ने बताया कि यह काजू का जंगल है तो मैं सम्मोहित-सा हो गया। इसके अलावा नारियल के कतारबद्ध लंबे-लंबे पेड़ और केले के घने झुरमुट मार्ग का शृंगार करते प्रतीत होते हैं। 

रघुराजपुर की विभूतियों को नमन
-------------------------------------------------------------
खैर! इस सफर का आनंद उठाते हुए जब हम रघुराजपुर पहुंचे तो शाम काफी हो गई थी और अभी हमें पुरी भी पहुंचना था। इसलिए बिना विलंब किए गांव, वहां की कला और कलाकारों के बारे में जानकारी जुटाने लगे। गांव में प्रवेश करते ही हमें दाहिनी ओर लगी तीन मूर्तियां नजर आईं। पट्टाचित्र कलाकार बसंत कुमार महाराणा ने बताया कि इन तीनों विभूतियों की बदौलत ही गांव को राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिली है। इन विभूतियों के नाम हैं प्रसिद्ध पट्टाचित्र कलाकार शिल्पगुरु पद्मभूषण डॉ. जगन्नाथ महापात्रा, ओडिसी नृत्य के गुरु पद्मश्री केलुचरण महापात्रा और पद्मश्री मगुनी चरण दास। लौटते वक़्त तीनों विभूतियों को नमन कर हमने पुरी की राह पकड़ी।

पुरी का पावन धाम, जहां अपने भाई-बहन के साथ विराजमान हैं भगवान जगन्नाथ
-------------------------------------------------------------
पुरी में भगवान जगन्नाथ का पावन धाम है। देश की पूर्व दिशा में स्थित इस धाम को आदि शंकराचार्य द्वारा स्थापित चार वैष्णव धामों में से एक माना जाता है। शेष तीन धाम हैं दक्षिण (तमिलनाडु) में स्थित रामेश्वरम धाम, पश्चिम (महाराष्ट्र) में स्थित द्वारका धाम और उत्तर (उत्तराखंड) में स्थित बदरीनाथ धाम। जब हम पुरी पहुंचे सांझ ढल चुकी थी। हमने अपने वाहन पार्किंग में खड़े किए और मंदिर जाने के लिए टोटो में सवार हो गए। यह सुविधा निःशुल्क है। तकरीबन दस मिनट लगे होंगे हमें मंदिर पहुंचने में। जिधर नजर दौड़ाओ भीड़ ही भीड़ नजर आ रही थी, 30 हजार के आसपास लोग तो रहे ही होंगे पूरे परिसर में। हालांकि, स्थानीय लोगों का कहना था कि भीड़ बहुत कम है और आसानी से हम मंदिर में प्रवेश पा जाएंगे। बहरहाल! जूते लॉकर में रखवाकर हमने एक मजबूत स्थानीय संपर्क के साथ तलाशी की प्रक्रिया से गुजरते हुए मुख्य द्वार से मंदिर परिसर में प्रवेश किया। अंदर पहुंचे तो पता चला कि भगवान के भोग का वक्त हो गया है। अब 45 मिनट बाद उनके दर्शन हो पाएंगे। दर्शन के लिए हजारों लोग लाइन में लगे थे, जिसे देख मेरे तो पसीने छूटने लगे। संपर्क ने बताया कि हमें मुख्य लाइन से नहीं जाना है, हमारे लिए प्रवेश की वीआईपी व्यवस्था है। 



साथियों से बिछड़े, फिर मिले
-------------------------------------------------------------
भोग के बाद जब हम वीआईपी द्वार पर पहुंचे तो वहां कम से कम 30 लोग हमसे आगे खड़े थे। हमारे पीछे लाइन में लगभग डेढ़ हजार लोग रहे होंगे। ऐसे में एक-दूसरे को धकियाते हुए हमने जैसे-तैसे मंदिर में प्रवेश किया। सभा मंडप में पैर रखने तक को जगह नहीं थी। इतनी भीड़ थी कि हमारे साथी तमाम प्रयासों के बावजूद एक-दूसरे से अलग हो गए। जब हम दर्शन कर बाहर आये तो हमारी संख्या सिर्फ सात थी, जबकि दर्शन के लिए 16 लोगों ने मंदिर में प्रवेश किया था। इसका नतीजा यह हुआ कि एक जगह एकत्र होने में ही हमें एक घंटा लग गया और रात साढ़े ग्यारह बजे के आसपास हम भुवनेश्वर अपने होटल वापस पहुंच पाये।

कटक के केंद्रीय चावल अनुसंधान संस्थान में हुआ आत्मीय स्वागत
-------------------------------------------------------------
दूसरा दिन भी व्यस्तताओं से भरा रहा। हमारी पहली मीटिंग राजभवन में ओडिशा के राज्यपाल डॉ. हरि बाबू कंभमपति के साथ थी। उनसे विकास योजनाओं पर लंबी परिचर्चा हुई। सवाल-जवाब का दौर चला। चाय की चुस्कियां ली गईं और पूरी प्रक्रिया में दोपहर के बारह बजे गए। अब हमें विद्याधरपुर, कटक स्थित केंद्रीय चावल अनुसंधान संस्थान (सीआरआरआई) पहुंचना था। इस संस्थान की स्थापना 23 अप्रैल 1946 को की गई थी। संस्थान भुवनेश्वर के बीजू पटनायक हवाई अड्डे से 35 किमी और कटक रेलवे स्टेशन से सात किमी की दूरी पर स्थित है। सीआरआरआई अधिक धान उगाने, किसानों के लिए खेती को आसान बनाने और पर्यावरण की मदद करने के तरीके खोजने पर ध्यान केंद्रित करता है। साथ ही धान की खेती को बेहतर और अधिक उत्पादक बनाने के लिए देश के विभिन्न हिस्सों में अन्य अनुसंधान केंद्रों के साथ भी काम करता है। यहां पहुंचते ही संस्थान के निदेशक डॉ. हेमंत कुमार भट्टाचार्य एवं उनकी टीम ने बेहद आत्मीयता से हमारा स्वागत किया। 

आनंददायी दावत, ज्ञानवर्धक परिचर्चा
-------------------------------------------------------------
हमने पहले तसल्ली से भोजन किया, जो तन-मन को आनंदित कर देने वाला था। आधा दर्जन सब्जियां, रायता, खीर, रोटी, सुगंधित चावल, अरहर की दाल और ओडिशा की प्रसिद्ध पारंपरिक मिठाई छेना पोड़ा (छेना केक) का स्वाद मैं अब भी भुला नहीं पा रहा हूं। इसके बाद परिचर्चा का कार्यक्रम रखा गया था, जिसमें संस्थान के बारे में बहुत कुछ जानने-समझने को मिला। हमें बताया गया कि संस्थान ने अब तक धान की 194 प्रजाति विकसित की हैं। इन प्रजाति का उपयोग देश के कुल धान क्षेत्र के लगभग 22 प्रतिशत हिस्से में किया जा रहा है। अपना उत्तराखंड भी इसमें शामिल है। अब बारी थी संस्थान परिसर के भ्रमण की, जो 60 हेक्टेयर प्रायोगिक कृषि भूमि में फैला हुआ है। इसके लिये हमें टोटो उपलब्ध कराए गए थे। लौटते हुए हम सभी ने नारियल पानी का आनंद उठाया। वक़्त काफी हो चुका था, हममें से अधिकांश साथियों का मन पुरी बीच (गोल्डन बीच) पर जाने का था। सो, तय हुआ कि जो साथी बीच पर नहीं जाना चाहते, वे एक कार से वापस होटल लौट सकते हैं। बाकी साथी शेष तीन कारों से पुरी बीच जाएंगे। 

पुरी का सुनहरा समुद्र तट, दूसरी दुनिया का-सा एहसास
-------------------------------------------------------------
मुझे तो जाना ही था, सो मैं बिना वक़्त गंवाए कार में सवार हो गया। हम तीन कारों में पुरी बीच की ओर बढ़ चले। अपराह्न के तीन बजे चुके थे और सूर्य धीरे-धीरे अस्तांचल की ओर अग्रसर था। ओडिशा पूर्वी प्रदेश है, इसलिए वहां अंधेरा जल्दी घिर जाता है, ठीक उसी तरह, जैसे भोर जल्दी दस्तक देती है। लेकिन, समंदर के करीब जाने की चाह में इस सबकी किसे परवाह थी। पुरी बीच अपने आप में अनूठा है। यह समुद्र तट बंगाल की खाड़ी की गर्जनापूर्ण लहरों और बढ़िया सुनहरी रेत के लिए जाना जाता है, इसलिए इसे गोल्डन बीच भी कहते हैं। जगन्नाथ धाम यहां से महज दो किमी के फासले पर है। यह बेहद खूबसूरत बीच है, जहां से सूर्यास्त और सूर्योदय का नजारा तो देखते ही बनता है। हम जब बीच पर पहुंचे तो अंधेरा घिर आया था। पूरा समुद्र तट रंग-बिरंगे विद्युत प्रकाश में नहाया हुआ था। पर्यटकों की भारी भीड़ थी और ऐसा प्रतीत हो रहा था, मानो हम किसी दूसरी दुनिया में आ गए हैं। समुद्र पास ही था, लेकिन नजर नहीं आ रहा था, वजह थी हाईवे के किनारे की दीवार। 

मध्यम रोशनी में चमकती लहरों का सम्मोहन
-------------------------------------------------------------
हमारी व्याकुलता बढ़ती जा रही थी, इसलिये कार से उतरते ही हम सीधे बीच की ओर चल पड़े। बड़ा लंबा-चौड़ा बीच है। रोशनी कम होने के बावजूद रेत की चमक साफ महसूस की जा सकती थी। दूर से तेजी के साथ करीब आ रही लहरें अजीब-सा सम्मोहन पैदा कर रही थीं। यहां समुद्र बेहद गहरा है और जरा-सी चूक होने पर लहरें अपनी लपेट में ले लेती हैं, इसलिए हम पानी में दूर तक नहीं गए। दिन का वक्त होता तो जरूर कुछ देर लहरों से अठखेलियां करते। खैर! वक्त हो चला था, इसलिए बीच से विदाई ली और चल पड़े अपने गंतव्य भुवनेश्वर की ओर। इस बीच हमें सोशल मीडिया से सूचना मिल चुकी थी कि  उत्तराखंड भाषा संस्थान की ओर से मित्र शीशपाल सिंह गुसाईं को वर्ष 2025 के साहित्य गौरव सम्मान से नवाजा जा रहा है। सम्मान 30 मार्च को अस्थायी राजधानी देहरादून में आयोजित समारोह में दिया जाएगा। इस सूचना से हमारी खुशी द्विगुणित हो गई। गोल्डन बीच से भुवनेश्वर की दूरी 61 किमी है, सो होटल तक पहुंचने में हमें ढाई घंटे लग गए, जहां शीशपाल भाई हमारा इंतजार कर रहे थे।

सीफा का दीदार, मछलियों का अनूठा संसार
-----------------------------------------------------------
25 मार्च, ओडिशा यात्रा का अंतिम दिन। दिन की शुरुआत रोज की तरह नाश्ते के साथ हुई और ठीक सवा नौ बजे हम निकल पड़े केंद्रीय मीठा जीवपालन अनुसंधान संस्थान (सीफा) की ओर। यह ओडिशा के कटक जनपद में 147 हेक्टेयर में फैला मीठे पानी की जलीय कृषि पर आधारित एक प्रमुख शोध संस्थान है। यह मॉडल ओडिशा को देश के अग्रणी मत्स्य उत्पादक राज्यों में स्थापित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। संस्थान के निदेशक डॉ. प्रमोद कुमार साहू ने हमें बताया कि संस्थान की ओर से विकसित तकनीकें कम लागत में मछली का अधिक उत्पादन देने में सक्षम हैं और इन्हें देश के विभिन्न भौगोलिक क्षेत्रों में अपनाया जा सकता है। हमारे इस दौरे का एक महत्वपूर्ण पहलू ओडिशा और उत्तराखंड के मत्स्य पालन मॉडल का तुलनात्मक अध्ययन भी रहा। जहां ओडिशा में बड़े पैमाने पर गर्म पानी आधारित मत्स्य पालन हो रहा है और वह उत्पादन में अग्रणी है, वहीं उत्तराखंड में ठंडे पानी की उच्च मूल्य वाली मछलियों, विशेषकर ट्राउट के माध्यम से गुणवत्ता आधारित मत्स्य पालन तेजी से विकसित हो रहा है। इस दौरान ब्लू इकोनॉमी के बारे में भी हमें बहुत-कुछ जानने-समझने को मिला। ब्लू इकोनॉमी यानी समुद्री संसाधनों का सतत एवं बेहतरीन उपयोग, जो देश की तस्वीर बदल सकता है। 

पारादीप की यादगार सैर
-----------------------------------------------------------
हमें अब यात्रा के अंतिम पड़ाव पारादीप की ओर बढ़ना था, इसलिए डॉ. साहू के भोजन करने के अनुरोध को विनम्रता पूर्वक अस्वीकार कर वहां से विदा ली। पारादीप की राह काफी कठिन है। हाईवे पर थोड़ा-थोड़ा अंतराल में अवरोधक हैं, जिससे वाहन को मनमाफिक गति से नहीं चलाया जा सकता। ऐसे में 120 किमी का सफर तय करने में हमें साढ़े तीन घंटे से अधिक का समय लग गया। अपराह्न के तीन बज चुके थे और पेट में चूहे कूद रहे थे। सो, सबसे पहले हमने भोजन करने में ही बेहतरी समझी और चल पड़े एक होटल की ओर। भोजन काफी स्वादिष्ट था, इसलिए पेट भरने में कोई कसर बाकी नहीं रखी और फिर बिना वक़्त गंवाए चल पड़े पोर्ट के गेट नंबर चार की ओर। पांच मिनट बाद ही समुद्र नजर आने लगा, बेहद शांत एवं गंभीर। कई जहाज गहरे पानी के इस बंदरगाह में लंगर डाले हुए थे। यह नजारा देख मैं स्वभाव के अनुरूप पारादीप का इतिहास टटोलने लगा। काफी कुछ तो मुझे जानकारी है, लेकिन बहुत-कुछ जानने में गूगल और एआई ने मेरी मदद की।

देश के समुद्री गौरव और विकास की एक जीवंत गाथा
-----------------------------------------------------------
ओडिशा के जगजीतसिंहपुर जनपद में महानदी और बंगाल की खाड़ी के मिलन स्थल पर स्थित पारादीप महज एक औद्योगिक शहर या बंदरगाह ही नहीं, बल्कि देश के समुद्री गौरव एवं विकास की एक जीवंत गाथा है। वर्ष 1966 में स्थापित यह पूर्वी तट का महत्वपूर्ण बंदरगाह है, जो मुख्य रूप से लौह अयस्क, थर्मल कोयला और अन्य सूखे माल के निर्यात के लिए जाना जाता है। प्राचीन काल में ओडिशा (कलिंग) के नाविक इसी तट से सुदूर दक्षिण-पूर्वी एशियाई देशों- मसलन जावा, सुमात्रा, बोर्नियो व बाली के लिए अपनी नौकाएं रवाना करते थे। बंदरगाह की नींव तीन जनवरी 1962 को तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने रखी थी। एक जनवरी 1965 को केंद्र सरकार ने इसका प्रबंधन ओडिशा सरकार से अपने हाथ ले लिया। 18 अप्रैल 1966 को इसे देश का आठवां प्रमुख बंदरगाह घोषित किया गया। इसकी स्थापना में ओडिशा के तत्कालीन मुख्यमंत्री बीजू पटनायक की प्रमुख भूमिका रही। स्वतंत्रता के बाद पूर्वी तट पर संचालित होने वाला यह देश का पहला प्रमुख बंदरगाह है। दिलचस्प बात यह है कि यह बंदरगाह एक कृत्रिम हार्बर पर बनाया गया है।

स्टीमर की सवारी, गहरे समुद्र की सैर
-----------------------------------------------------------
खैर! कहने को तो बहुत कुछ है, लेकिन मूल बात यह है कि अब हमें स्टीमर की सवारी करनी थी। सो, हम दूसरी ओर समुद्र के करीब पहुंच गए। दूर से एक स्टीमर हमारी ओर चला आ रहा था। उसके तट से लगते ही एक-एक कर हम उसमें सवार हो गए और निकल पड़े समुद्र की सैर पर। पायलट ने हमें बताया कि यहां समुद्र 18 मीटर गहरा है। लगभग 20 मिनट हम समुद्र में रहे होंगे। सूरज ढलान की ओर था और अभी हमें पारादीप पोर्ट अथॉरिटी के दफ्तर में पहुंचकर बंदरगाह, वहां से होने वाले कारोबार और भविष्य के योजनाओं के बारे में जानकारी प्राप्त करनी थी। प्राधिकरण के डिप्टी चेयरमैन टी.वेणुगोपाल ने हमें बताया कि यह बंदरगाह केंद्र और राज्य सरकारों के समन्वित प्रयासों से विकसित होकर देश की अर्थव्यवस्था की एक महत्वपूर्ण जीवनरेखा बन चुका है। उन्होंने यह भी बताया कि हरित पहल के तहत क्षेत्र में लगभग छह लाख पौधों का रोपण कर पर्यावरण संरक्षण को प्राथमिकता दी गई है। इसकी झलक हमें प्राधिकरण के परिसर में फैली हरियाली के रूप में देखने को मिली। उसे देख जहां तक नजर दौड़ाओ, मन प्रफुल्लित हो उठता है। 



गंगा के प्रदेश से आए थे, समंदर से तो मिलना ही था
-----------------------------------------------------------
वहां से विदा लेने के बाद हम सभी साथी अब बीच पर जाने के लिए लालायित थे। गंगा के प्रदेश से आए थे, समंदर से तो मिलना ही था। हालांकि, मुख्य रूप से एक बंदरगाह शहर होने के कारण पारादीप में गोवा या पुरी जैसे विकसित और कई पर्यटक बीच नहीं हैं। यहां समुद्र तट अपेक्षाकृत शांत, प्राकृतिक और कम भीड़भाड़ वाले हैं। यहां सबसे प्रसिद्ध एवं मुख्य बीच महानदी एवं बंगाल की खाड़ी के संगम पर स्थित है। यह बीच सुनहरी रेत, साफ नीले पानी, विशाल तट और बड़ी-बड़ी चट्टानों के लिए जाना जाता है, जिसकी बंदरगाह से दूरी तीन किमी के आसपास है। शांत वातावरण और हरे-भरे जंगल के किनारे स्थित इस बीच पर पर्यटक घूमने, फोटो खिंचवाने और आराम करने के लिए पहुचते हैं। हम भी कुछ देर समुद्र की लहरों में भीगते रहे। मन कर रहा था कि डुबकियां लगा ली जाएं, लेकिन वक़्त अनुमति नहीं दे रहा था। जल्द भुवनेश्वर पहुंचकर वापसी की तैयारी भी करनी थी। कुछ साथियों का बाजार जाकर खरीदारी करने का प्लान भी था, सो समंदर की करीब आती लहरों से विदा लेकर हमने भुवनेश्वर की राह पकड़ ली।

सुखद स्मृतियां समेटकर पहुंचे दून
-----------------------------------------------------------
26 मार्च को सुबह 6:20 बजे की फ्लाइट से हमें सीधे देहरादून के लिए वापसी करनी थी, इसलिए रात 10:30 बजे के आसपास होटल पहुंचकर भोजन किया और अपने-अपने रूम में चले गए। ब्रह्ममुहूर्त में ठीक पौने तीन बजे आंख खुल गई। झटपट फ्रेश हुए और तैयार होकर रिसेप्शन पर पहुंच गए। साढ़े चार बजे तक सभी साथी वहां एकत्र हो चुके थे। हमें हवाई अड्डे पहुंचाने के लिए चार कार भी आ गई थीं। ठीक पांच बजे हम बीजू पटनायक हवाई अड्डे के लिए रवाना हुए और बीस मिनट में वहां पहुंच गए। लगभग 20 मिनट में सारी प्रकिया पूरी करने के बाद हम इंडिगो के जहाज में सवार हो चुके थे। तय समय पर जहाज ने रनवे छोड़ दिया और ठीक साढ़े आठ बजे हम जॉलीग्रांट स्थित देहरादून हवाई अड्डे पर थे। देहरादून से पीआईबी की चार कार हमें लेने हवाई अड्डे पहुंच गई थीं। संजीव भाई का आग्रह था कि नाश्ता करने के बाद ही अपने गंतव्यों के लिए प्रस्थान करेंगे। भूख लगी ही थी, सो इन्कार करना समझदारी नहीं थी, कम से कम मेरे लिए को कतई नहीं। नाश्ता करने के बाद पीआईबी के दफ्तर में संजीव भाई ने हमें स्मृति चिह्न भेंटकर अपने-अपने गंतव्य के लिए विदा किया।



Monday, 30 March 2026

30-03-2026 (मशकबीन : स्कॉटलैंड की धुन, उत्तराखंड की आत्मा)


google.com, pub-1212002365839162, DIRECT, f08c47fec0942fa0
मशकबीन : स्कॉटलैंड की धुन, उत्तराखंड की आत्मा 

--------------------------------------------------------------
दिनेश कुकरेती
स्कॉटलैंड के हाइलैंडर्स जब ब्रिटिश सेना के साथ उत्तराखंड के पहाड़ों में आए, तो उनके कंधों पर ग्रेट हाइलैंड बैगपाइप भी लटका हुआ था। पहाड़ी लोगों ने इसे देखा और अपनी भाषा में नाम दे दिया — मशकबीन। आज यह वाद्य उत्तराखंडी लोक संस्कृति में इतना रच-बस गया है कि बिना इसके गढ़वाल, कुमाऊं व जौनसार के किसी भी मांगलिक आयोजन, तीज-त्योहार, छोलिया नृत्य या कौथिग की कल्पना भी अधूरी लगती है। ढोल-दमाऊ की गहरी थाप के साथ जब मशकबीन की तीखी-मधुर धुन गूंजती है तो कदम खुद-ब-खुद थिरकने लगते हैं और मन का मयूर झूम उठता है।

पहाड़ी सैनिक लाये यह विरासत 
----------------------------------------
ब्रिटिश शासन के दौरान 19वीं सदी में बैगपाइप को पहाड़ी इलाकों में लाया गया, लेकिन इसे लोकप्रियता मिली 20वीं सदी में। प्रथम विश्व युद्ध में गढ़वाली और कुमाऊंनी सैनिकों ने यूरोप में जाकर बैगपाइप बजाना सीखा। द्वितीय विश्व युद्ध में भी कई सैनिकों को इसका प्रशिक्षण दिया गया। फौज से लौटकर इन सैनिकों ने यह कला गांवों तक पहुंचाई। इससे ढोल-दमाऊ के साथ मशकबीन भी शादी-ब्याह, जन्मोत्सव और स्थानीय उत्सवों का अनिवार्य हिस्सा बन गया। भारतीय सेना में पाइप बैंड का स्थान बनने से तो इसका सम्मान और भी बढ़ गया। दरअसल, उत्तराखंड की ऊबड़-खाबड़ पहाड़ियां और ठंडी हवाएं स्कॉटलैंड के हाइलैंड्स से काफी मिलती-जुलती थीं। शायद इसी वजह से ब्रिटिश रेजिमेंट ने यहां इस वाद्य को आसानी से अपनाया। आज मशकबीन सिर्फ एक वाद्य यंत्र नहीं, बल्कि उत्तराखंड की सैन्य परंपरा, बहादुरी और सांस्कृतिक अनुकूलन का जीवंत प्रतीक बन चुका है।

ऐसे पड़ा मशकबीन नाम
----------------------------
बैगपाइप का मशकबीन नाम इसकी बनावट से ही निकला। ‘मशक’ यानी चमड़े की थैली (बैग), जिसमें फूंक मारकर हवा भरी जाती है, और 'बीन’ यानी बांसुरी जैसी पाइप। स्थानीय लोगों ने इसे मशकबाजा, बीनबाजा या मोरबीन भी कहा। यह नाम इतना सरल और सटीक था कि जल्दी ही लोकप्रिय हो गया। 

पूरी हुई फूंक से बजने वाले सुरीले वाद्य की कमी 
-----------------
उत्तराखंड के पारंपरिक वाद्य समूह में ढोल, दमाऊ, नगाड़ा, हुड़का, डौंर-थाली जैसे ताल वाद्य तो थे, लेकिन फूंक से बजने वाला कोई मधुर, सुरीला वाद्य नहीं था। मशकबीन ने ठीक इसी कमी को पूरा किया। आज कुमाऊं के छोलिया नृत्य और गढ़वाल के पौणा नृत्य में तलवारों की चमक और कदमताल की खूबसूरती मशकबीन की धुनों से कई गुना बढ़ जाती है। ‘बेडू पाको बारामासा, ओ नरैणा काफल पाको चैत’, ‘टक-टका-टक कमला’ व ‘कैले बजे मुरूली, ओ बैणा ऊंची-ऊंची डान्यूं मा’ जैसे लोकगीत जब मशकबीन पर गूंजते हैं, तो पूरा माहौल रस में डूब जाता है। 

आज भी स्कॉटिश धुनों का असर 
-------------------
पुराने मशक्या (वादक) आज भी कभी-कभी स्कॉटिश धुनें बजा देते हैं, हालांकि उन्हें यह पता भी नहीं होता कि वे किस देश की धुन बजा रहे हैं। दरअसल, मशकबीन की सुर-लहरियों में अब भी अंग्रेजी सिखलाई का हल्का-सा रंग बाकी है। हालांकि, पहाड़ी लोकगीतों के रंग घुलने से इसमें और भी मिठास आ गई है। 

बनावट और कठिनाई 
-------------------------
मशकबीन एक सुषिर वाद्य (वायु वाद्य) है। इसमें पांच पाइप होते हैं। एक पाइप से चमड़े की मशक में फूंक मारकर हवा भरी जाती है। दूसरे पाइप (चंडल या मेलोडी पाइप) को उंगलियों से नियंत्रित कर सुर निकाला जाता है। बाकी तीन ड्रोन पाइप कंधे पर रखे जाते हैं, जो निरंतर मधुर सुर लहरियां उत्पन्न करते हैं। मशकबीन को बजाना आसान नहीं। इसके लिए फेफड़ों की जबरदस्त ताकत, सांस पर सूक्ष्म नियंत्रण और लगातार अभ्यास चाहिए। फिर भी उत्तराखंड के गांवों में आज भी कई ऐसे कलाकार हैं, जिन्होंने इस कला में महारथ हासिल की हुई है।

यहां बनती है मशकबीन
---------------------------
देश में मेरठ और जालंधर में इसकी अच्छी-खासी फैक्टरियां हैं। कीमत दो हजार से पांच-छह हजार रुपये तक हो सकती है। हालांकि, पारखी अभी भी पाकिस्तान के सियालकोट में बनी मशकबीन को बेहतरीन मानते हैं, लेकिन उत्तराखंड में मेरठ और जालंधर वाली मशकबीन का ही सबसे ज्यादा चलन है। 

युवा पीढ़ी संभाल रही विरासत
----------------------------------
उत्तराखंड संस्कृति विभाग की गुरु-शिष्य परंपरा योजना (कला दीक्षा) के तहत मशकबीन को संरक्षण मिल रहा है। कई युवा कलाकार अब वरिष्ठ गुरुओं से इस कला का प्रशिक्षण ले रहे हैं। यह देखकर उम्मीद जागती है कि आने वाली पीढ़ियां भी इस अनोखे वाद्य को अपनी संस्कृति का अभिन्न अंग बनाए रखेंगी। देखा जाए तो मशकबीन सिर्फ एक बैगपाइप नहीं, बल्कि यह स्कॉटलैंड से आए एक मेहमान का उत्तराखंडी रूपांतरण है। यह पहाड़ की बहादुरी, सैनिकों की वापसी, लोकगीतों की मिठास और सांस्कृतिक अनुकूलन की कहानी है। जब भी पहाड़ों में इसकी धुन सुनाई दे, तो याद आता है — कुछ धुनें सीमाओं को पार कर जाती हैं और दिलों में हमेशा के लिए बस जाती हैं। 
इन्‍हें भी पढ़ें- 
--------------------------------------------------------------Mashakbeen : Scotland’s Tune, Uttarakhand’s Soul
--------------------------------------------
Dinesh Kukreti
When the Scottish Highlanders arrived in the mountains of Uttarakhand with the British Army, they carried the Great Highland Bagpipe slung over their shoulders. The local hill people saw it and gave it a name in their own language — Mashakbeen. Today, this instrument has become so deeply ingrained in Uttarakhand’s folk culture that no auspicious ceremony, festival, Chholiya dance, or Kauthig in Garhwal, Kumaon, or Jaunsar feels complete without it. When the deep beats of the dhol-damaun blend with the sharp, sweet melody of the Mashakbeen, feet start tapping on their own and the peacock of the heart begins to dance. 
The Heritage Brought by Pahari Soldiers
The bagpipe was introduced to the hilly regions during British rule in the 19th century, but it gained real popularity in the 20th century. During World War I, Garhwali and Kumaoni soldiers learned to play the bagpipe while serving in Europe. Many soldiers were also trained in it during World War II. After returning from the army, these soldiers spread this art to their villages. As a result, Mashakbeen, along with dhol-damaun, became an essential part of weddings, birth celebrations, and local festivals. Its prestige grew even further when pipe bands were established in the Indian Army. 
The rugged mountains and cold winds of Uttarakhand closely resemble the Scottish Highlands. Perhaps this is why British regiments easily adopted the instrument here. Today, Mashakbeen is not just a musical instrument but a living symbol of Uttarakhand’s military tradition, bravery, and cultural adaptation. 

How It Got the Name Mashakbee
The name Mashakbeen comes from its construction. “Mashak” means a leather bag (the bag into which air is blown), and “Been” refers to the flute-like pipe. Locals also called it Mashakbaja, Beenbaja, or Morb een. The name was so simple and accurate that it quickly became popular. 

Filling a Long-Felt Gap
Uttarakhand’s traditional musical ensembles already had percussion instruments like dhol, damaun, nagada, hurka, and daunr-thali, but there was no sweet, melodic wind instrument. Mashakbeen perfectly filled this gap. Today, the brilliance of swords and the beauty of footwork in Kumaon’s Chholiya dance and Garhwal’s Pauna dance are enhanced many times over by the tunes of the Mashakbeen.
When folk songs like “Bedu Pako Baramasa, O Naraina Kaphal Pako Chait”, “Tak-Taka-Tak Kamla”, and “Kaile Baje Muruli, O Baina Unchi-Unchi Danyun Ma” resonate on the Mashakbeen, the entire atmosphere becomes drenched in emotion. 
Scottish Tunes Still Echo
Even today, veteran Mashakya (players) occasionally play Scottish tunes, often without knowing which country’s melody they are performing. Traces of British influence still remain in the musical phrases of the Mashakbeen. However, the blending of local Pahari folk songs has added even more sweetness to it.

Construction and Difficulty
Mashakbeen is an aerophone (wind instrument). It has five pipes. One pipe is used to blow air into the leather bag. The second pipe (chanter or melody pipe) is fingered to produce the tune. The remaining three drone pipes rest on the shoulder and continuously produce a harmonious drone. Playing the Mashakbeen is not easy — it requires powerful lungs, fine breath control, and consistent practice. Yet, many artists in the villages of Uttarakhand have mastered this art.

Where Mashakbeen is Made
In India, good factories for it exist in Meerut and Jalandhar. Prices range from ₹2,000 to ₹5,000–6,000. Connoisseurs still consider the ones made in Sialkot, Pakistan, to be the best, but in Uttarakhand, instruments from Meerut and Jalandhar are the most commonly used. 

The Young Generation is Preserving the Heritage
Under the Uttarakhand Culture Department’s Guru-Shishya Parampara scheme (Kala Diksha), efforts are being made to preserve the Mashakbeen tradition. Many young artists are now receiving training from senior gurus. This gives hope that future generations will also keep this unique instrument as an inseparable part of their culture. 
Ultimately, Mashakbeen is not just a bagpipe. It is the Uttarakhandi transformation of a guest that came from Scotland. It tells the story of the bravery of the hills, the return of soldiers, the sweetness of folk songs, and cultural adaptation. Whenever you hear its melody in the mountains, you are reminded that some tunes cross all borders and make a home in hearts forever.

03-04-2026 (तन-मन में स्फूर्ति भर गईं ओडिशा की अविस्मरणीय अनुभूतियां)

google.com, pub-1212002365839162, DIRECT, f08c47fec0942fa0 तन-मन में स्फूर्ति भर गईं ओडिशा की अविस्मरणीय अनुभूतियां ------------------------...