Monday, 16 February 2026

16-02-2026 (राजवंशों के दौर में लोक का संदेशवाहक रहा है धतिया नगाड़ा)


google.com, pub-1212002365839162, DIRECT, f08c47fec0942fa0
राजवंशों के दौर में लोक का संदेशवाहक रहा है धतिया नगाड़ा

-------------------------------------------------------------
दिनेश कुकरेती
हाड़ों में जब संचार के कोई आधुनिक साधन नहीं थे, न मोबाइल, न रेडियो, न इंटरनेट ही, तब एक स्थान से दूसरे स्थान तक सूचना पहुंचाने का सबसे प्रभावी माध्यम था धतिया नगाड़ा। ‘धतिया’ या ‘धदिया’ शब्द की उत्पत्ति ‘धात’ या ‘धाद’ से हुई है यानी ऐसी गर्जनादार या जोरदार आवाज़, जो दूर-दूर तक पहाड़ों में गूंजती रहे। गढ़वाल-कुमाऊं में इसे डौंडी पीटना (मुनादी करना) और संस्कृत में दुंदुभि कहते हैं। रोहिल्ला, कत्यूरी, चंद, पंवार आदि राजवंशों के दौर में यह नगाड़ा राज्य का सबसे विश्वसनीय संदेशवाहक था। युद्ध की घोषणा, आपदा की चेतावनी, उत्सव की सूचना या राजा का कोई महत्वपूर्ण संदेश, सब इसी की थाप से प्रसारित होते थे। इसे ‘दैन दमु’ भी कहते थे, क्योंकि इसे दाहिनी ओर से बजाया जाता था। आज यह परंपरा लगभग लुप्तप्राय है, लेकिन चुनिंदा जगहों पर अभी भी इसकी गूंज सुनाई देती है।

विशाल आकार और भारी वजन
------------------------------------
सामान्य नगाड़े से कहीं बड़ा और भारी होता था धतिया नगाड़ा। तांबे या अष्टधातु से बना इसका पुड़ा (ढोलक जैसा हिस्सा) डेढ़ फुट या उससे ज्यादा व्यास का होता था, और वजन 15-20 किलो तक। कुमाऊं के प्रसिद्ध जागेश्वर धाम में आज भी एक ऐतिहासिक धतिया नगाड़ा मौजूद है। चंद राजवंश के राजा दीप चंद ने इसे भेंट चढ़ाया था। इसका वजन 16 किलो है और पुड़े का व्यास करीब 18 इंच। इसे वृद्ध जागेश्वर के पास ‘धती ढुंग’ (नगाड़ा रखने के लिए विशेष चट्टान) पर रखकर बजाया जाता था। इस जगह से रीठागाड़ी, गंगोलीहाट, चौकोड़ी और बेरीनाग तक की घाटियां साफ दिखती हैं और आवाज भी दूर तक पहुंचती थी। उस समय गंगोलीहाट मणकोटी शासकों के अधीन था।

बजाने के लिए चुने जाते थे खास स्थान
--------------------------------------------
राजशाही में धतिया नगाड़ा बजाने के लिए ऊंचे, खुले और रणनीतिक स्थान तय किए जाते थे, जहां से आवाज पहाड़ों की घाटियों में गूंजकर दूर-दूर तक फैल सके। नगाड़े को एक खास पत्थर ‘धती ढुंग’ पर रखा जाता था। इसे लकड़ी के दो मोटे, मजबूत सोटों (लांकुड़) से बजाया जाता था, इतनी जोर से कि पूरा इलाका थरथरा उठता था।

सहायक वाद्यों का शाही जत्था
-----------------------------------
धतिया नगाड़ा अकेला नहीं बजता था। यह वीरता का प्रतीक माना जाता था, इसलिए इसके साथ बजते थे:
  • दो विजयसार ढोल
  • दो तांबे के दमाऊ
  • दो तुरही
  • दो नागफणी
  • दो रणसिंघा
  • दो भंकोर
  • दो कंसेरी
बजाने से पहले इन सभी की विधि-विधान से पूजा होती थी। यह एक पूर्ण सैन्य-संगीत परेड जैसा लगता था।

भैंसे की खाल से बना मजबूत पुड़ा
--------------------------------------
धतिया नगाड़े का पुड़ा भैंसे के चर्म से बनता था, खासकर चार-पांच साल के भैंसे की खाल इसके लिए चुनी जाती थी। खाल को धूप में सुखाकर, फिर तेल में भिगोया जाता था। तेल से पुड़ा नरम और टिकाऊ हो जाता है और डंडों की मार से फटता नहीं है। तैयार नगाड़े पर साल में तीन-चार बार काले तिल का तेल या घी लगाया जाता था, फिर आग की आंच दिखाकर तेल अंदर तक सोखा जाता था। डोरियां भी भैंसे की आंत के चमड़े से बनती थीं।

उत्तराखंड का सबसे बड़ा नगाड़ा कनार गांव में
----------------------------------------------------
पिथौरागढ़ जिले के अंतिम गांव कनार (समुद्रतल से 8,000 फीट ऊंचाई पर, छिपला केदार पर्वत शृंखला के मध्य) में भगवती कोकिला का मंदिर है। यहां मौजूद धतिया नगाड़ा उत्तराखंड का सबसे बड़ा माना जाता है। मेले के दौरान 22 धानी (22 हिस्सों वाला) वाला नगाड़ा मंदिर प्रांगण में बजता है। एक 12 धानी वाला नगाड़ा दो लोग कंधे पर टांगकर घुमाते हैं और तीसरा व्यक्ति बजाता है। मां भगवती कोकिला मल्ल अस्कोट के गोरी छाल क्षेत्र की आराध्य देवी हैं और यह नगाड़ा उनकी पूजा का अभिन्न हिस्सा है।

मंदिरों में आज भी बजती है नौबत
--------------------------------------
देवभूमि उत्तराखंड के कई प्रसिद्ध मंदिरों में आज भी नौबत (नौ अलग-अलग स्वर-ताल) लगाने की परंपरा है। नौबत के समय के साथ लय-ताल भी भिन्न-भिन्न होती है। इसका मुख्य उद्देश्य लोक को जागृत करना (जगाना) है।  पीढ़ियों पहले आपदा, उत्सव या अनुष्ठान की सूचना भी मंदिरों से नगाड़े के जरिये ही फैलती थी। आज धतिया नगाड़ा ज्यादातर इतिहास की किताबों और कुछ चुनिंदा मंदिरों तक सिमट गया है, लेकिन इसकी गूंज आज भी उन पहाड़ों में सुनाई देती है, जहां कभी पूरा राज्य इसकी थाप पर थरथराता था। यह सिर्फ एक वाद्य नहीं, उत्तराखंड की सांस्कृतिक, ऐतिहासिक और सामाजिक यादों का जीवंत प्रतीक है। 

No comments:

Post a Comment

Thanks for feedback.

16-02-2026 (राजवंशों के दौर में लोक का संदेशवाहक रहा है धतिया नगाड़ा)

google.com, pub-1212002365839162, DIRECT, f08c47fec0942fa0 राजवंशों के दौर में लोक का संदेशवाहक रहा है धतिया नगाड़ा -------------------------...