विज्ञान पर्यटन
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आइये! हिमालय में ‘ग्रैंड कैन्यन’ की सैर पर चलें, छिपा है यहां जीवाश्म का दुर्लभ खजाना
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दिनेश कुकरेती
चमोली जिले की नीती घाटी जितनी खूबसूरत है, उतनी ही रहस्यमयी भी। घाटी का चीन सीमा से लगा लपथल और रिमखिम के बीच का क्षेत्र तो अपने गहरे एवं विशाल प्राकृतिक खड्डों (गहरी चट्टानी घाटी) के कारण ‘भारत का ग्रैंड कैन्यन’ कहलाता है। घाटी की खासियत यह है कि दिन के उजाले में भी इसका बड़ा हिस्सा रोशनी से अछूता रहता है। इसलिए स्थानीय लोग इसे ‘डरावनी घाटी’ कहते हैं। सबसे अहम बात यह कि लपथल क्षेत्र में शालिग्राम जीवाश्म (फ़ॉसिल्स) का खजाना छिपा हुआ है, जो पहली बार तब देश-दुनिया की नजरों में आया, जब जून 2025 में बीरबल साहनी पुराविज्ञान संस्थान (बीएसआइपी) लखनऊ के वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. हुकम सिंह व डॉ. रणवीर सिंह यहां भूगर्भीय अध्ययन को पहुंचे। इस दौरान उन्होंने लपथल क्षेत्र का व्यापक सर्वेक्षण किया। इसी विशेषता के कारण लपथल क्षेत्र को ‘जीवाश्म राष्ट्रीय उद्यान’ घोषित किए जाने की मांग हो रही है। शालिग्राम सिर्फ पत्थर नहीं, बल्कि इसे करोड़ों वर्ष पुराना जीवाश्म माना जाता है। वैज्ञानिक अध्ययन में स्पष्ट हो चुका है कि शालिग्राम समुद्र के पहाड़ में परिर्वतन का गवाह रहा है।
दिनेश कुकरेती
चमोली जिले की नीती घाटी जितनी खूबसूरत है, उतनी ही रहस्यमयी भी। घाटी का चीन सीमा से लगा लपथल और रिमखिम के बीच का क्षेत्र तो अपने गहरे एवं विशाल प्राकृतिक खड्डों (गहरी चट्टानी घाटी) के कारण ‘भारत का ग्रैंड कैन्यन’ कहलाता है। घाटी की खासियत यह है कि दिन के उजाले में भी इसका बड़ा हिस्सा रोशनी से अछूता रहता है। इसलिए स्थानीय लोग इसे ‘डरावनी घाटी’ कहते हैं। सबसे अहम बात यह कि लपथल क्षेत्र में शालिग्राम जीवाश्म (फ़ॉसिल्स) का खजाना छिपा हुआ है, जो पहली बार तब देश-दुनिया की नजरों में आया, जब जून 2025 में बीरबल साहनी पुराविज्ञान संस्थान (बीएसआइपी) लखनऊ के वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. हुकम सिंह व डॉ. रणवीर सिंह यहां भूगर्भीय अध्ययन को पहुंचे। इस दौरान उन्होंने लपथल क्षेत्र का व्यापक सर्वेक्षण किया। इसी विशेषता के कारण लपथल क्षेत्र को ‘जीवाश्म राष्ट्रीय उद्यान’ घोषित किए जाने की मांग हो रही है। शालिग्राम सिर्फ पत्थर नहीं, बल्कि इसे करोड़ों वर्ष पुराना जीवाश्म माना जाता है। वैज्ञानिक अध्ययन में स्पष्ट हो चुका है कि शालिग्राम समुद्र के पहाड़ में परिर्वतन का गवाह रहा है।
समुद्रतल से 4,700 मीटर की ऊंचाई तक स्थित लपथल क्षेत्र अब सड़क मार्ग से जुड़ चुका है और प्रशासन स्थानीय निवासियों के साथ पर्यटकों को यहां जाने की अनुमति देने लगा है। इससे लपथल क्षेत्र के पर्यटन के बड़े केंद्र के रूप
में उभरने की संभावनाएं प्रबल हुई हैं। जून 2025 में लपथल क्षेत्र का व्यापक सर्वेक्षण करने वाले बीरबल साहनी पुराविज्ञान संस्थान (बीएसआईपी) लखनऊ के वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. हुकम सिंह बताते हैं कि 15-16 करोड़ वर्ष पहले यह क्षेत्र टेथिस सागर का हिस्सा रह चुका है, लिहाजा यह भूविज्ञान की दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है। वह बताते हैं कि इस दौरान उन्होंने यहां बहुतायत में शालिग्राम पत्थर की मौजूदगी पाई थी, जो कि जुरासिक काल के समुद्री अवसाद हैं। यह वह समय है, जब पृथ्वी पर डायनासोर का प्रभुत्व था। तब वर्तमान हिमालय का यह भूभाग टेथिस महासागर की गहरी समुद्री तलहटी का हिस्सा था। यही वजह है कि यहां समुद्री जीवों के जीवाश्म प्राकृतिक रूप से प्रचुर मात्रा में संरक्षित हैं। इनमें सबसे महत्वपूर्ण कुंडलाकार अमोनाइट हैं, जिन्हें भारतीय संस्कृति में शालिग्राम के नाम से जाना जाता है। वैज्ञानिक बताते हैं कि अमोनाइट तेजी से विकसित होने वाले समुद्री जीव थे, जिनके जीवाश्म भू-वैज्ञानिक काल निर्धारण और प्राचीन समुद्री पर्यावरण के अध्ययन में अत्यंत महत्वपूर्ण माने जाते हैं।
1980 के दशक की शुरुआत में पहली बार हुआ अध्ययन
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में उभरने की संभावनाएं प्रबल हुई हैं। जून 2025 में लपथल क्षेत्र का व्यापक सर्वेक्षण करने वाले बीरबल साहनी पुराविज्ञान संस्थान (बीएसआईपी) लखनऊ के वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. हुकम सिंह बताते हैं कि 15-16 करोड़ वर्ष पहले यह क्षेत्र टेथिस सागर का हिस्सा रह चुका है, लिहाजा यह भूविज्ञान की दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है। वह बताते हैं कि इस दौरान उन्होंने यहां बहुतायत में शालिग्राम पत्थर की मौजूदगी पाई थी, जो कि जुरासिक काल के समुद्री अवसाद हैं। यह वह समय है, जब पृथ्वी पर डायनासोर का प्रभुत्व था। तब वर्तमान हिमालय का यह भूभाग टेथिस महासागर की गहरी समुद्री तलहटी का हिस्सा था। यही वजह है कि यहां समुद्री जीवों के जीवाश्म प्राकृतिक रूप से प्रचुर मात्रा में संरक्षित हैं। इनमें सबसे महत्वपूर्ण कुंडलाकार अमोनाइट हैं, जिन्हें भारतीय संस्कृति में शालिग्राम के नाम से जाना जाता है। वैज्ञानिक बताते हैं कि अमोनाइट तेजी से विकसित होने वाले समुद्री जीव थे, जिनके जीवाश्म भू-वैज्ञानिक काल निर्धारण और प्राचीन समुद्री पर्यावरण के अध्ययन में अत्यंत महत्वपूर्ण माने जाते हैं।
1980 के दशक की शुरुआत में पहली बार हुआ अध्ययन
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लपथल क्षेत्र का विस्तृत वैज्ञानिक अध्ययन पहली बार 1980 के दशक की शुरुआत में किया गया था। लगभग चार दशक बाद बीएसआईपी के वैज्ञानिकों ने इस क्षेत्र का दोबारा सर्वेक्षण कर अमोनाइट के साथ-साथ बेलेमनाइट गैस्ट्रोपोड और अन्य समुद्री जीवाश्मों का भी संग्रह किया। इन जीवाश्मों के अध्ययन से जुरासिक काल की समुद्री जैव-विविधता, प्राचीन पर्यावरण और हिमालय के भूवैज्ञानिक विकास के बारे में नई जानकारियां मिलने की उम्मीद है। वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. हुकम सिंह के अनुसार लपथल क्षेत्र भविष्य में जुरासिक काल के समुद्री जीवन व टेथिस महासागर के इतिहास को समझने के लिए देश के सबसे महत्वपूर्ण जीवाश्म स्थलों में से एक सिद्ध हो सकता है।
चट्टानों में दबे हैं अमोनाइट के जीवाश्म
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चट्टानों में दबे हैं अमोनाइट के जीवाश्म
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लपथल क्षेत्र में विलुप्त हो चुकी प्रजातियों जैसे अमोनाइट के जीवाश्म चट्टानों में दबे हुए मिलते हैं। वैज्ञानिकों ने अपने अध्ययन के दौरान यहां बेलेमनाइट, गैस्ट्रोपोड व अन्य समुद्री जीवों के जीवाश्म भी एकत्र किए। अमोनाइट अपनी तीव्र विकास दर के कारण भू-वैज्ञानिक काल निर्धारण के सर्वश्रेष्ठ सूचक जीवाश्मों में गिने जाते हैं, जबकि बेलेमनाइट प्राचीन स्क्विड जैसे समुद्री जीव थे और गैस्ट्रोपोड समुद्री घोंघों के पूर्वज माने जाते हैं।
जीवाश्म राष्ट्रीय उद्यान घोषित होने से बढ़ेगा पर्यटन
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जीवाश्म राष्ट्रीय उद्यान घोषित होने से बढ़ेगा पर्यटन
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पिथौरागढ़ वन प्रभाग की 2011 से 2021 तक की प्रबंधन योजना में भी लपथल क्षेत्र को जीवाश्म राष्ट्रीय उद्यान घोषित करने का सुझाव दिया गया है। पर्यटन विशेषज्ञ कहते हैं कि नंदा देवी राष्ट्रीय पार्क के कोर जोन में स्थित लपथल क्षेत्र में अब तक सेना की ही सक्रियता रही है। लेकिन, सड़क निर्माण के बाद आमजन को यहां जाने की अनुमति मिलने से इसे संरक्षित क्षेत्र घोषित किया जाना चाहिए। यह कदम नीती घाटी के पर्यटन में मील का पत्थर साबित होगा।
सुमना व मुनस्यारी से होती है ट्रेकिंग
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सुमना व मुनस्यारी से होती है ट्रेकिंग
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लपथल क्षेत्र एक ‘कोल्ड डेजर्ट’ (ठंडा रेगिस्तान) है, जो कुमाऊं, गढ़वाल व चीन की सीमा से लगा हुआ है। पर्यटकों को यहां तक जाने के लिए सुमना (चमोली) या मुनस्यारी (पिथौरागढ़) से कई दिनों की ट्रेकिंग करनी पड़ती है।
इस प्रयोगशाला में होता है फ़ॉसिलिज़्ड रेज़िन का अध्ययन
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लखनऊ स्थित बीरबल साहनी पुराविज्ञान संस्थान में स्थापित देश की पहली अत्याधुनिक एम्बर विश्लेषण एवं पैलियोएंटोमोलॉजी प्रयोगशाला में लाखों वर्ष पुराने जीवाश्मीकृत पेड़ के गोंद व राल में संरक्षित कीट, मकड़ी, परागकण, पौधों के सूक्ष्म अवशेष व अन्य सूक्ष्म जीवों का अध्ययन किया जाता है। एम्बर (फ़ॉसिलिज़्ड रेज़िन) को प्रकृति का ‘समय कैप्सूल’ माना गया है, क्योंकि इसमें फंसे जीव अपने सूक्ष्मतम स्वरूप में सुरक्षित रहकर प्राचीन
जैव विविधता, जलवायु और पारिस्थितिकी तंत्र के बारे में अनूठी जानकारी प्रदान करते हैं। यह प्रयोगशाला देश में एम्बर आधारित पुराजीव अध्ययन को नई दिशा दे रही है।
शालिग्राम का धार्मिक महत्व
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जैव विविधता, जलवायु और पारिस्थितिकी तंत्र के बारे में अनूठी जानकारी प्रदान करते हैं। यह प्रयोगशाला देश में एम्बर आधारित पुराजीव अध्ययन को नई दिशा दे रही है।
शालिग्राम का धार्मिक महत्व
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भारतीय संस्कृति में शालिग्राम शिला को भगवान विष्णु स्वरूप माना जाता है। यह पत्थर सबसे ज्यादा नेपाल में मिलता है। इसलिए चमोली की नीती घाटी में शालिग्राम की बहुतायत इसे विशिष्ट बनाती है। यह मुख्य रूप से नेपाल की गंडकी (नारायणी) नदी के तल से प्राप्त होता है। 'पद्मपुराण' और 'स्कंद पुराण' के अनुसार शालिग्राम में स्वयं भगवान विष्णु निवास करते हैं। सनातनी परंपरा में घर के मंदिर में शिवलिंग के साथ शालिग्राम रखना बहुत उत्तम माना जाता है।








