सावधान! अंदर कुत्ता है
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दिनेश कुकरेती
मुझे पहली बार 1990 में दूनघाटी को देखने का सौभाग्य मिला था। तब मैं ग्रेज्युएशन कर रहा था और किसी प्रतियोगी परीक्षा के सिलसिले में दून आया था। मुझे अच्छी तरह याद है, उस दौरान मैं तीन दिन अपने दोस्त के पिता के घर नेहरूग्राम में रुका था। वे सेना से सेवानिवृत्त होने के बाद ऑर्डिनेंस फैक्ट्री में नौकरी कर रहे थे और किराये पर मकान लेकर रहते थे। हालांकि, मैंने परीक्षा तो नहीं दी, लेकिन शहर को खूब घूमा।खासकर पलटन बाजार, राजपुर रोड, ईसी रोड, गांधी पार्क आदि स्थानों की खूबसूरती का जी-भरकर दीदार किया। तब इस शहर की खूबसूरती देखते ही बनती थी। चारों ओर नहरों का जाल बिछा हुआ था, जिनमें साफ पानी बहता था। शाम के वक्त नहरों के किनारे ठंडी हवाएं अंतर्रात्मा को प्रफुल्लित कर देतीं। वैसे इससे पहले मैं लखनऊ भी काफी घूम चुका था, लेकिन दून में जो अनुभूति हुई, वह अपने आप में अलग तरह की थी। तब शहर काफी सिमटा हुआ था। हर तरफ सड़क के किनारे बाग-बागीचे नजर आते थे। ट्रैफिक भी बहुत ज्यादा नहीं था। ऐसे में सड़कों पर टहलने का आनंद ही कुछ और होता था।

महीना तो याद नहीं रहा, पर वह इतवार का दिन था। मैंने भी सुबह नौ बजे के आसपास बस पकडी़ और परीक्षा देने निकल पडा़। चुक्खूवाला क्षेत्र के किसी विद्यालय (शायद श्री गुरु नानक पब्लिक इंटर कॉलेज) में सेंटर पडा़ था। बस चकराता रोड की तरफ नहीं जाती थी, इसलिए कंडक्टर ने घंटाघर के पास ही उतार दिया। खैर! सेंटर नजदीक ही था, सो मैं पैदल ही उस ओर चल पडा़। थोडी़ दूर ही गया हूंगा कि अचानक मन में ख्याल आया, तैयारी तो है नहीं, खामखां क्यों तीन घंटे खराब किए जाएं।
बस! फिर क्या था, बगैर मन में तनाव लाए मैं शहर भ्रमण पर निकल गया। किधर जाना है, यह कुछ तय नहीं था। सो, जिधर मन करता, राह पकड़ लेता। अब मैं एक पाश कालोनी के आगे खडा़ था। दरअसल, वहां एक बडी़-सी कोठी के गेट पर लगे बोर्ड को देखकर मेरे कदम ठिठक गए थे। बोर्ड पर लिखा था, "सावधान! अंदर कुत्ता है।" मेरे लिए यह किसी आश्चर्य से कम नहीं था, क्योंकि मैं जीवन में पहली दफा किसी घर के गेट पर ऐसा दुर्लभ संदेश पढ़ रहा था। मैं कभी कोठी को देखता, तो कभी गेट को। लेकिन, फिर यह सोचकर कि शहरों में ऐसा हो भी सकता है, आगे बढ़ गया।

कुछ कदम ही आगे बढ़ा था कि एक और कोठी के गेट पर लगे बोर्ड ने फिर मेरे कदम ठिठका दिए। साथ ही मेरा आश्चर्य भी बढ़ गया। लिखा था, "कुत्ते से सावधान!" थोडा़ और आगे चला तो एक और गेट पर लिखा मिला "अंदर कुत्ता है, बिना परिचय के गेट न खोलें"। मुझे यह तो इल्म था कि शहरों में कुत्ते अच्छे-खासे रसूखदार होते हैं, लेकिन इन सूक्त वाक्यों को पढ़कर तो ऐसा लगने लगा, मानो कुत्तों के आगे इन्सान की कोई औकात ही नहीं है। मैं सोच रहा था कि "बिना परिचय के गेट न खोलें" का मतलब कहीं यह तो नहीं कि गेट खोलने वाला कुत्ते का परिचित होना चाहिए।
मुझे याद आने लगा अपना गांव, जहां हर घर की चौखट के ऊपर लिखा रहता था "सुस्वागतम"। आज भी गांवों में "सुस्वागतम" की यह परंपरा खत्म नहीं हुई है। कुत्तों को लोग गांव में भी पालते हैं, लेकिन उनका दर्जा इन्सान से ऊपर नहीं रहता। लेकिन, यहां तो तस्वीर ही उलटी है। लोग इन्सान से ज्यादा कुत्तों की संगत में रहना पसंद करते हैं। खासकर, ऊंची सोसायटी में तो ऐसी रिस्पेक्ट नाते-रिश्तों की भी नहीं होती, जैसी कि कुत्ते की।

अब तो मुझे भी यह सब देख आश्चर्य नहीं होता, लेकिन 30-35 साल पहले की बात ही कुछ और है। तब हम आगे जरूर बढ़ रहे थे, लेकिन इतने नहीं, जितने कि आज बढ़ गए हैं। तब रिश्तों में बनावट नहीं थी, संबंधों की अहमियत थी। मुहल्ले मकानों के समूह नहीं, परिवार हुआ करते थे। कुत्ते लोग तब भी पालते थे, लेकिन उन कुत्तों की समाज के प्रति एक सोच थी। वो पूरे मुहल्ले को पहचानते थे, इसलिए गेट पर उनके नाम की तख्ती लटकाने की जरूरत नहीं पड़ती थी। ऐसा भी कह सकते हैं कि तब कुत्तों की वैरायटी चेंज नहीं हुई थी यानी वे इन्सान नहीं बने थे।
अब तो चाहरदीवारी में कैद रहने वाला हर कुत्ता इन्सान बन बैठा है। उसके महीने का खर्च इतना है, जितने में चार व्यक्तियों का एक सामान्य परिवार गुजर कर ले। खैर! तब से लेकर अब तक एक लंबा अर्सा बीत चुका है। इस कालखंड में पाश ही नहीं आम कालोनियों पर भी श्वान संस्कृति पूरी तरह हावी हो गई। हां! यह जरूर है कि आम कालोनियों के कुत्ते पाश कालोनियों के कुत्तों जैसा रुतबा हासिल नहीं कर पाए, लेकिन अपने घरों में तो राज इन्हीं कुत्तों का है। इतना ही नहीं, कुत्तों ने लोगों की जीवनचर्या भी पूरी तरह बदलकर रख दी है।
सुबह नौ-नौ, दस-दस बजे बिस्तर छोड़ने वाला व्यक्ति भी बिना अलार्म के ब्रह्ममुहूर्त में जाग जाता है। कुत्ते को नित्य क्रियाओं से निवृत्त जो कराना है। यह अलग बात है इस व्यस्तता के बीच उसे कई बार तो खुद के नहाने का भी वक्त नहीं मिल पाता। वह बच्चों की पढा़ई-लिखाई का भले ही ध्यान न रख पाए, लेकिन "डाग शो" के लिए कुत्ते को अपडेट रखना उसकी नैतिक जिम्मेदारी है। नाक का सवाल जो है, शो में कुत्ते से जरा भी ऊंच-नीच हो गई तो सोसायटी में नजरें मिलाना मुश्किल हो जाएगा। लोग मजाक उडा़एंगे कि, देखो! फलाने के कुत्ते में इतनी भी तहजीब नहीं है।

आपको मेरी ये तमाम बातें मजाक लग सकती हैं। आप यह भी कह सकते हो कि खाली दिमाग शैतान का घर। पर मितरों! यकीन जानिए कि सांस्कृतिक उन्नयन के इस दौर में वह कुत्ता ही है, जिसने हमें समाज में नजरें मिलाने का हौसला दिया है। आप घर में एक लाख रुपये कीमत की गाय पाल लीजिए। आपकी हैसियत ग्वाले की ही रहेगी। चाहे आप दूध बेचकर हजारों क्यों न कमा रहे हों। लेकिन, अगर आपने घर में पांच-दस हजार रुपये कीमत का भी कुत्ता पाल लिया तो समझ लीजिए आप शहंशाह हो गए।

कहने का मतलब आपको रसूख की जिंदगी जीनी है तो जैसे भी हो, एक कुत्ता पाल लीजिए। फिर भला वह लेंडी यानी स्लम डाग ही क्यों न हो। उसके लिए पेट काटना पडे़ तो काटिए। हफ्ते-दस दिन में व्रत-उपवास रखना पडे़ तो रखिए। लेकिन, मेहरबानी कर कुत्ता जरूर पालिए। अपनी संस्कृति को बचाने के लिए इतनी कुर्बानी तो आपको देनी ही पडे़गी।

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