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मुंह में मिठास और तन-मन में स्फूर्ति घोल देते हैं बुखणा
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दिनेश कुकरेती
गांव को छोड़े लंबा अर्सा गुजर गया, लेकिन गांव की वो सुनहरी यादें आज भी आंखों के पोर गीले कर देती हैं। याद आता है वो दौर, जब पहाड़ की कोई मां अपनी दूर ब्याही बेटी को किसी नाते-रिश्ते वाले या परिचित के जरिये मायके की आसल-कुशल भेजती थी, तो उसके हाथ समौण (याद) के रूप में मौसम के अनुरूप एक छोटी-सी पोटली भी जरूर देती थी, जिसमें बुखणाया खाजा बंधा होता था। भंगजीर की पत्तियों की महक लिए धान के उस अधपके बुखणा की पोटली को देखकर बेटी भाव-विह्वल हो उठती और जब उसे खोलती तो आंखें नम हो जातीं। लगता, सारे संसार की सारी खुशियां उसकी मुट्ठी में समा गई हैं। इसी तरह घसियारियां (बहू-बेटी) जब घास-लकड़ी लेने जंगल जाती थीं तो उनके सिर पर बुखणा की पोटली भी जरूर होती थी। काम के बीच थकान लगते ही पोटली खोलकर बुखणा के दो-चार दाने मुंह में डाल देतीं और क्षणभर में तन स्फूर्तिवान हो जाता।दरअसल, बुखणा उत्तराखंड के पर्वतीय अंचल का वो चलता-फिरता भोजन है, जो भूख मिटाने के साथ तन को ऊर्जा प्रदान करता है और मन को सुकून पहुंचाता है। हालांकि अब ये परंपरा दूर-दराज के गांवों में ही बची हुई है, लेकिन यादों में समाये भीना रे बाजार्या भीना.. मेरा चूड़ा-बुखणा चाखि जा, चूड़ा-बुखणा.., आवा दगड़ियों, बुखणा खै जावा...जैसे लोकगीत हृदय के तारों को झंकृत कर देते हैं। प्रवासी मन उदास हो उठता है और मुंह में वही मनभावन मिठास घुलने लगती है। चलिये, आज हम भी उस पुरानी याद को जीवित करते हैं। आइये! जानें, कैसे बनता है ये जादुई बुखणा!
चावल के बुखणा (सादा च्यूड़ा)
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- धान की फसल कटाई के समय अधपकी बालियां चुन लें।
- अगर बालियां पूरी सूख चुकी हों, तो 10-12 घंटे पानी में भिगोकर नरम करें।
- लोहे की कढ़ाई में हल्की आंच पर भूनें – बालियां फूटने लगेंगी, खुशबू फैल जाएगी।
- ठंडा होने पर ओखली में कूटें। साथ में भंगजीर के ताजे हरे पत्ते डालें – ये महक और स्वाद दोगुना कर देते हैं।
- सूप से फटककर भूसा अलग कर लें। बस! तैयार हैं कुरकुरे, सुगंधित चावल के बुखणा। मुंह में डालते ही वो हल्की मिठास और पहाड़ की ताजगी...
चावल के मीठे बुखणा (गुड़ वाला च्यूड़ा)
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- चावल के वजन का आधा गुड़ लें, थोड़े पानी में उबालकर चाशनी तैयार करें।
- कढ़ाई में चावल भूनें।
- फटाफट भुने चावल को गुड़ की चाशनी में डालकर अच्छे से मिलाएं।
- बर्तन ढककर 5-10 मिनट रखें, ताकि गुड़ अच्छे से सोख ले।
- ढक्कन हटाकर हल्का सूखने दें। ठंडा होने पर स्वादिष्ट मीठे बुखणा तैयार! बच्चों से लेकर बूढ़ों तक, सब दीवाने हो जाते हैं।
चीणा के बुखणा (चिन्याल)
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एक दौर में चीणा (वानस्पतिक नाम: Panicum miliaceum) के बुखणा (चिन्याल) पहाड़ में काफी प्रचलित रहे हैं। उत्तरकाशी जनपद के एक कस्बे का ‘चिन्यालीसौड़' नाम तो वहां चीणा की फसल के कारण ही पड़ा। कुछ लोग तो सिर्फ चिन्याल बनाने के लिए चीणा की खेती करते थे। आज भले ही चीणा की खेती कम हो गई है, लेकिन जहां बची है, वहां चिन्याल आज भी राजा है।
- चीणा की बालियां भूनें, ठीक वैसे ही जैसे धान की भूनी जाती हैं।
- ओखली में कूटते समय भंगजीर के पत्ते जरूर डालें। महक ऐसी कि दूर से ही मुंह में पानी आ जाए।
- स्वाद में धान के बुखणा से कई गुणा लाजवाब।
कौणी-झंगोरा के बुखणा
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चावल और चीणा के साथ झंगोरा और कौणी के बुखणा बनाने की परंपरा भी पहाड़ में रही है। कौणी के बुखणा को कौन्याळ कहा जाता है। इन्हें बनाने का तरीका भी चावल और चीणा के बुखणा बनाने जैसा ही है, लेकिन स्वाद में थोड़ा अंतर है। पहाड़ में बुखणा के शौकीन लोग खास प्रजाति के उखड़ी धान (ऐसा धान जिसमें रोपाई नहीं की जाती, बल्कि खेत में सीधे बीज छिड़ककर उगाया जाता है) और अन्य मोटे चावल की प्रजातियों से भी बुखणा बनाते हैं।
भुजे भट और गेहूं के बुखणा
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- भट (काले सोयाबीन) को भूनकर बुखणा बनाएं – सर्दियों में बारिश-बर्फबारी के दिनों में ये कमाल का साथी है।
- सर्दी भागती है, खांसी-जुकाम में राहत मिलती है।
- गेहूं और भट मिलाकर बनाया जाए, तो स्वाद द्विगुणित हो जाता है।
‘रेडी टू ईट’, लेकिन ‘फास्ट फूड’ नहीं
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बुखणा पहाड़ का असली फास्ट फूड है – लेकिन आधुनिक फास्ट फूड की तरह सिर्फ पेट नहीं भरता, बल्कि तन-मन को जीवंत करता है। आहिस्ता-आहिस्ता चबाओ, जैसे नारियल चबाते हैं – मुंह में मिठास घुलती है, शरीर में स्फूर्ति दौड़ती है। दांत मजबूत होते हैं, पाचन आसान हो जाता है।
परफेक्ट बनाने का राज
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- अखरोट, सिरोला (चुलू की मीठी गिरी), तिल, भंगजीर के पत्ते या बीज मिला लीजिए।
- अखरोट दिल को मजबूत रखता है, शुगर कंट्रोल करता है।
- तिल कैल्शियम देता है और सिरोला का वो खास पहाड़ी स्वाद।
सुपाच्य, पौष्टिक और ऊर्जा का खजाना
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बुखणा सिर्फ भूख नहीं मिटाता – ये पहाड़ की मेहनत, मां की ममता, और संस्कृति का स्वाद है। आज जब हम शहरों में भाग रहे हैं, तो कभी-कभी एक मुट्ठी बुखणा मुंह में डालकर रुक जाओ... और याद करो वो सुनहरा दौर, जब खुशियां पोटली में बंधी आती थीं।









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