मुझे दुनिया की हर भाषा-बोली से अनुराग है। मैं जानता हूं कि किसी भी भाषा के विलुप्त होने का बहुआयामी दुष्प्रभाव होता है। उस भाषा को बोलने वाले समुदाय का इतिहास, संस्कृति-विरासत और समूची पारंपरिक ज्ञान प्रणाली समाप्त हो जाती है। हजारों वर्षों का पारंपरिक ज्ञान दो-चार पीढ़ियों में समूल नष्ट हो जाता है। दुर्भाग्य से गढ़वाली-कुमाऊंनी भाषाएं भी इसी राह पर हैं। वह लगातार कमजोर तन्वंगी (कृशांगी) और परित्यक्त होती जा रही हैं। एक अनुमान के मुताबिक गढ़वाली-कुमाऊंनी की तीन-चौथाई शब्द-संपदा प्रचलन से बाहर हो चुकी है। नई पीढ़ी अगर बोलती भी है तो प्रायः ठेठ शब्दों का शुद्ध उच्चारण नहीं कर पाती, मुख-सुख के अनुकूल विकृत करके बोलती है। धाराप्रवाह गढ़वाली-कुमाऊंनी बोलने वाली उम्रदराज पीढ़ी आगामी एक-दो दशक में नहीं रहेगी और अगर यही हाल रहा तो कुछ और दशकों बाद की कल्पना आप स्वयं कर सकते हैं।

इस हाल में तो सदी के अंत तक विलुप्त हो जाएगी गढ़वाली-कुमाऊंनी
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यूनेस्को की रिपोर्ट 'एटलस ऑफ वर्ल्ड लैंग्वेज इन डेंजर' के मुताबिक दुनिया में इस समय दो दर्जन वर्चस्व वाली भाषाएं हैं, जिन्हें दुनिया की आधी आबादी बोलती है। वहीं आधी आबादी सात हजार भाषाएं बोलती है, जिनमें से आधी इस सदी के अंत तक विलुप्त हो जाएंगी। इनमें गढ़वाली-कुमाऊंनी भी शामिल हैं। यूनेस्को की रिपोर्ट में गढ़वाली-कुमाऊंनी को एक 'असुरक्षित' भाषा के रूप में वर्गीकृत किया गया है, जो तेजी से विलुप्त हो रही हैं। इसका सबसे बड़ा कारण है तेजी से हो रहा पलायन। दरअसल, उत्तराखंड के 25 लाख से ज़्यादा गढ़वाली प्रवासी अब देश के विभिन्न महानगरों समेत आस-पास के शहरों में रहते हैं। समय के साथ, पहाड़ में भी लोगों ने हिंदी बोलना ज़्यादा शुरू कर दिया है। नई पीढ़ी तो गढ़वाली-कुमाऊंनी बोलने में लगभग परहेज कर रही है। वहीं, विकसित क्षेत्रों में लोग गढ़वाली-कुमाऊंनी बोलने को हीनता का प्रतीक समझते हैं। नतीजा युवा पीढ़ी अपनी जड़ों से लगातार दूर होती जा रही है। इससे भी बुरी बात यह है कि गढ़वाली-कुमाऊंनी भाषा के संरक्षण के लिए लोगों या नेताओं की ओर से कोई सक्रिय प्रयास नहीं किए जा रहे। अन्यथा अब तक ये भाषाएं आठवीं अनुसूची में शामिल हो चुकी होतीं।

कब, कितनी भाषाएं हुईं आठवीं अनुसूची में शामिल
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भारत में 114 भाषायें और 216 मातृभाषायें बोली जाती हैं। इनमें 22 भाषाओं को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल किया जा चुका है। ये भाषायें हैं असमिया, उड़िया, उर्दू, कन्नड़, कश्मीरी, कोंकणी, गुजराती, डोगरी, तमिल, तेलगू, नेपाली, पंजाबी, बांग्ला, बोड़ो, मणिपुरी, मराठी, मलयालम, मैथिली, संथाली, संस्कृत, सिंधी और हिंदी। इनमें से असमिया, बांग्ला, गुजराती, हिंदी, कन्नड़, कश्मीरी, मलयालम, मराठी, ओडिया, पंजाबी, संस्कृत, तमिल, तेलगू और उर्दू को वर्ष 1950, सिंधी को वर्ष 1967, कोंकणी, मणिपुरी और नेपाली को वर्ष 1992 और बोडो, डोगरी, मैथिली और संथाली को वर्ष 2003 में संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल किया गया।

भाषाओं का वर्गीकरण
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- भारतीय आर्य परिवार यानी भारोपीय परिवार की कुल 20 भाषाओं में से 15 आठवीं अनुसूची में शामिल हैं
- द्रविड़ परिवार की कुल 17 भाषाओं में से चार आठवीं अनुसूची में शामिल हैं
- आस्ट्रो-एशियाई परिवार की कुल 14 भाषाओं में से एकमात्र संथाली आठवीं अनुसूची में शामिल है
- तिब्बती-बर्मी परिवार की कुल 14 भाषाओं में से दो मणिपुरी व बोडो आठवीं अनुसूची में शामिल हैं
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संस्कृत, हिंदी, मराठी, कोंकणी, नेपाली, डोगरी, मैथिली, बोडो व संथाली। देश की 50 प्रतिशत से अधिक आबादी नागरी लिपि का प्रयोग करती है। गढ़वाली-कुमाऊंनी भाषाएं, जिनकी लिपि देवनागरी है, भारतीय आर्य परिवार की भाषाएं हैं।
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वर्तमान में आठवीं अनुसूची में शामिल करने के लिए 36 भाषाओं की मांग सरकार के पास लंबित है। किसी भी भाषा को आठवीं अनुसूची में शामिल करने के लिए संविधान में कोई अलग मानदंड निर्धारित नहींं है।

क्वालीफाई करना पड़ता है किसी एक भाषा का प्रश्नपत्र
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मुख्यमंत्री सम्मेलन-1961 की सिफारिश के अनुसार माध्यमिक स्कूल तक पढ़ाई का माध्यम आठवीं अनुसूची में शामिल कोई एक भाषा होनी चाहिए। यूपीएससी की सिविल सेवा परीक्षा के उम्मीदवारों को आठवीं अनुसूची में शामिल किसी एक भाषा का प्रश्न पत्र क्वालीफाई करना होता है। उनके पास विकल्प होता है कि वह अनुसूची में शामिल भाषाओं के साहित्य में से किसी एक भाषा का प्रश्न पत्र ले सकते हैं। उन्हें यह भी विकल्प दिया जाता है कि प्रश्नों का उत्तर अंग्रेजी या आठवीं अनुसूची में शामिल किसी एक भाषा में लिख सकते हैं। लिखित परीक्षा में उम्मीदवार जो माध्यम चुनता है, साक्षात्कार में भी वही माध्यम चुनने की अनुमति दी जाती है।

उत्तराखंड में बोली जाती हैं पांच भाषाएं
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उत्तराखंड में गढ़वाली, कुमाऊंनी, जौनसारी, पंजाबी (गुरमुखी) व उर्दू भाषाएं बोली जाती हैं। इनमें गुरमुखी व उर्दू को वर्षों पूर्व आठवीं अनुसूची में शामिल किया जा चुका है।

जनगणना परिपत्र के भाषा वाले कॉलम में अनिवार्य रूप से दर्ज करें अपनी मातृभाषा
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देश में 16वीं जनगणना की तैयारियां शुरू हो गई हैं, जो कि एक अक्टूबर 2026 और 1 मार्च 2027 को दो चरणों में आयोजित की जाएगी। बर्फीले और दूरदराज के क्षेत्रों, जैसे जम्मू और कश्मीर, लद्दाख, हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड में जनगणना एक अक्टूबर 2026 से शुरू होगी, जबकि देश के बाकी हिस्सों के लिए संदर्भ तिथि एक मार्च 2027 निर्धारित है। इस बार जनगणना में जाति गणना भी शामिल होगी और यह पूरी तरह से डिजिटल माध्यमों से की जाएगी। इस दौरान आपके पास जनगणना परिपत्र के भाषा वाले कॉलम में अपनी मातृभाषा गढ़वाली, कुमाऊंनी, जौनसारी को दर्ज करने का सुनहरा मौका है। इसलिए आपसे करबद्ध गुजारिश है कि भाषा वाले कॉलम में अनिवार्य रूप से अपनी मातृभाषा का उल्लेख करें। ताकि इन भाषाओं को बोलने वालों की संख्या के आधार पर संविधान की आठवीं अनुसूची में स्थान दिलाने के लिए हम अपना दावा मुक्कमल तौर पर पेश कर सकें। याद रहे यह मौका 10 साल में एक बार आता है। सो, इस बार चूक गए तो बहुत देर हो चुकी होगी और हाथ मलने के सिवा कोई विकल्प नहीं बचने वाला।
- Of the 20 languages of the Indo-Aryan family, or Indo-European family, 15 are included in the Eighth Schedule.
- Of the 17 languages of the Dravidian family, four are included in the Eighth Schedule.
- Of the 14 languages of the Austro-Asiatic family, only Santhali is included in the Eighth Schedule.
- Of the 14 languages of the Tibeto-Burman family, two, Manipuri and Bodo, are included in the Eighth Schedule.





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