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मशकबीन : स्कॉटलैंड की धुन, उत्तराखंड की आत्मा
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दिनेश कुकरेती
स्कॉटलैंड के हाइलैंडर्स जब ब्रिटिश सेना के साथ उत्तराखंड के पहाड़ों में आए, तो उनके कंधों पर ग्रेट हाइलैंड बैगपाइप भी लटका हुआ था। पहाड़ी लोगों ने इसे देखा और अपनी भाषा में नाम दे दिया — मशकबीन। आज यह वाद्य उत्तराखंडी लोक संस्कृति में इतना रच-बस गया है कि बिना इसके गढ़वाल, कुमाऊं व जौनसार के किसी भी मांगलिक आयोजन, तीज-त्योहार, छोलिया नृत्य या कौथिग की कल्पना भी अधूरी लगती है। ढोल-दमाऊ की गहरी थाप के साथ जब मशकबीन की तीखी-मधुर धुन गूंजती है तो कदम खुद-ब-खुद थिरकने लगते हैं और मन का मयूर झूम उठता है।
पहाड़ी सैनिक लाये यह विरासत
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ब्रिटिश शासन के दौरान 19वीं सदी में बैगपाइप को पहाड़ी इलाकों में लाया गया, लेकिन इसे लोकप्रियता मिली 20वीं सदी में। प्रथम विश्व युद्ध में गढ़वाली और कुमाऊंनी सैनिकों ने यूरोप में जाकर बैगपाइप बजाना सीखा। द्वितीय विश्व युद्ध में भी कई सैनिकों को इसका प्रशिक्षण दिया गया। फौज से लौटकर इन सैनिकों ने यह कला गांवों तक पहुंचाई। इससे ढोल-दमाऊ के साथ मशकबीन भी शादी-ब्याह, जन्मोत्सव और स्थानीय उत्सवों का अनिवार्य हिस्सा बन गया। भारतीय सेना में पाइप बैंड का स्थान बनने से तो इसका सम्मान और भी बढ़ गया। दरअसल, उत्तराखंड की ऊबड़-खाबड़ पहाड़ियां और ठंडी हवाएं स्कॉटलैंड के हाइलैंड्स से काफी मिलती-जुलती थीं। शायद इसी वजह से ब्रिटिश रेजिमेंट ने यहां इस वाद्य को आसानी से अपनाया। आज मशकबीन सिर्फ एक वाद्य यंत्र नहीं, बल्कि उत्तराखंड की सैन्य परंपरा, बहादुरी और सांस्कृतिक अनुकूलन का जीवंत प्रतीक बन चुका है।
ऐसे पड़ा मशकबीन नाम
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बैगपाइप का मशकबीन नाम इसकी बनावट से ही निकला। ‘मशक’ यानी चमड़े की थैली (बैग), जिसमें फूंक मारकर हवा भरी जाती है, और 'बीन’ यानी बांसुरी जैसी पाइप। स्थानीय लोगों ने इसे मशकबाजा, बीनबाजा या मोरबीन भी कहा। यह नाम इतना सरल और सटीक था कि जल्दी ही लोकप्रिय हो गया।
पूरी हुई फूंक से बजने वाले सुरीले वाद्य की कमी
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उत्तराखंड के पारंपरिक वाद्य समूह में ढोल, दमाऊ, नगाड़ा, हुड़का, डौंर-थाली जैसे ताल वाद्य तो थे, लेकिन फूंक से बजने वाला कोई मधुर, सुरीला वाद्य नहीं था। मशकबीन ने ठीक इसी कमी को पूरा किया। आज कुमाऊं के छोलिया नृत्य और गढ़वाल के पौणा नृत्य में तलवारों की चमक और कदमताल की खूबसूरती मशकबीन की धुनों से कई गुना बढ़ जाती है। ‘बेडू पाको बारामासा, ओ नरैणा काफल पाको चैत’, ‘टक-टका-टक कमला’ व ‘कैले बजे मुरूली, ओ बैणा ऊंची-ऊंची डान्यूं मा’ जैसे लोकगीत जब मशकबीन पर गूंजते हैं, तो पूरा माहौल रस में डूब जाता है।
आज भी स्कॉटिश धुनों का असर
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पुराने मशक्या (वादक) आज भी कभी-कभी स्कॉटिश धुनें बजा देते हैं, हालांकि उन्हें यह पता भी नहीं होता कि वे किस देश की धुन बजा रहे हैं। दरअसल, मशकबीन की सुर-लहरियों में अब भी अंग्रेजी सिखलाई का हल्का-सा रंग बाकी है। हालांकि, पहाड़ी लोकगीतों के रंग घुलने से इसमें और भी मिठास आ गई है।
बनावट और कठिनाई
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मशकबीन एक सुषिर वाद्य (वायु वाद्य) है। इसमें पांच पाइप होते हैं। एक पाइप से चमड़े की मशक में फूंक मारकर हवा भरी जाती है। दूसरे पाइप (चंडल या मेलोडी पाइप) को उंगलियों से नियंत्रित कर सुर निकाला जाता है। बाकी तीन ड्रोन पाइप कंधे पर रखे जाते हैं, जो निरंतर मधुर सुर लहरियां उत्पन्न करते हैं। मशकबीन को बजाना आसान नहीं। इसके लिए फेफड़ों की जबरदस्त ताकत, सांस पर सूक्ष्म नियंत्रण और लगातार अभ्यास चाहिए। फिर भी उत्तराखंड के गांवों में आज भी कई ऐसे कलाकार हैं, जिन्होंने इस कला में महारथ हासिल की हुई है।
यहां बनती है मशकबीन
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देश में मेरठ और जालंधर में इसकी अच्छी-खासी फैक्टरियां हैं। कीमत दो हजार से पांच-छह हजार रुपये तक हो सकती है। हालांकि, पारखी अभी भी पाकिस्तान के सियालकोट में बनी मशकबीन को बेहतरीन मानते हैं, लेकिन उत्तराखंड में मेरठ और जालंधर वाली मशकबीन का ही सबसे ज्यादा चलन है।
युवा पीढ़ी संभाल रही विरासत
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उत्तराखंड संस्कृति विभाग की गुरु-शिष्य परंपरा योजना (कला दीक्षा) के तहत मशकबीन को संरक्षण मिल रहा है। कई युवा कलाकार अब वरिष्ठ गुरुओं से इस कला का प्रशिक्षण ले रहे हैं। यह देखकर उम्मीद जागती है कि आने वाली पीढ़ियां भी इस अनोखे वाद्य को अपनी संस्कृति का अभिन्न अंग बनाए रखेंगी। देखा जाए तो मशकबीन सिर्फ एक बैगपाइप नहीं, बल्कि यह स्कॉटलैंड से आए एक मेहमान का उत्तराखंडी रूपांतरण है। यह पहाड़ की बहादुरी, सैनिकों की वापसी, लोकगीतों की मिठास और सांस्कृतिक अनुकूलन की कहानी है। जब भी पहाड़ों में इसकी धुन सुनाई दे, तो याद आता है — कुछ धुनें सीमाओं को पार कर जाती हैं और दिलों में हमेशा के लिए बस जाती हैं।
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