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Sunday, 27 June 2021

13-06-2021 ( Engagement rasgullas and those two meetings)


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(भाग - तीन)
सगाई के रसगुल्ले और वो दो मुलाकातें
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दिनेश कुकरेती
गाई हो चुकी थी, लेकिन दोस्तों को इसकी भनक तक नहीं थी। हां! मोहल्ला-पडो़स में जरूर लड्डू बांटे जा चुके थे। रिश्तेदारी में भी जानकारी हो चुकी थी। बस! दोस्त रह गए थे, जिन्हें बताया जाना बाकी था। इसकी शुरुआत आफिस से ही होनी थी। पौने दस बजे के आसपास मैं घर से आफिस के लिए निकला। आफिस से महज पचास कदम पहले रास्ते में ही मिठाई की दुकान पड़ती है, सो मैं सीधे वहीं जा धमका। दो मिनट सोचता रहा कि क्या लिया जाए, फिर आधा किलो छोटे वाले रसगुल्ले लिए और चढ़ने लगा आफिस की सीढि़यां।
आफिस में सबसे पहले हमारा इंचार्ज पहुंचता था। सो, मैं सीधे इंचार्ज के कक्ष में पहुंचा और रसगुल्ले का डिब्बा खोलकर सामने कर दिया। साथ ही विनम्रता से कहा - "भाई साहब! लीजिए मुंह मीठा कीजिए।"

इंचार्ज के चेहरे पर मुस्कान के साथ सवाल भी तैरने लगे। फिर मेरी तरफ मुखातिब हो बोला- "किस खुशी में कुकरेती जी।"

"भाई साहब! सगाई की खुशी में" - मैं बोला।

इंचार्ज ने फिर व्यग्रता से पूछा- "किसकी?"

"जी भाई साहब! मेरी" - मैंने कहा।

यह सुनते ही इंचार्ज ऐसे उछला, मानो 440 वोल्ट का  करंट लगा हो। फिर स्वयं को संयत करते हुए बोला- "पर कब?"

"भाई साहब! कल"- मैंने कहा।

"कल? पर किस वक्त? दिनभर तो आप यहां से हिले ही नहीं"- इंचार्ज ने पूछा।

जी लंच टाइम में मैं सीधे लड़की के घर ही चला गया था- "मैंने कहा।"
"क्या...? वाह! कुकरेती जी...मान गया आपको। छुपे रुस्तम निकले आप तो। कब बात हुई, कब मुलाकात हुई और कब सगाई...किसी को हवा तक नहीं लगी" - इंचार्ज ने कहा।

"बस! भाई साहब, बन गया ऐसा ही संयोग" - मैंने कहा।

"बधाई हो यार! बहुत-बहुत बधाई!" - इंचार्ज ने एक रसगुल्ला मुंह में डालते हुए कहा।

तब तक अन्य साथी भी आफिस पहुंच चुके थे। सारे ही मुझे कौतुहलभरी निगाहों से देख रहे थे। खैर! सभी ने मुंह मीठा किया और साथ में दावत की भी डिमांड कर दी। मैंने वादा किया कि जल्द बैठेंगे।

एक और महत्वपूर्ण बात, जो आज तक मैंने किसी को भी नहीं बताई। मुझे जरूरी भी नहीं लगा इसे किसी से साझा करना। पर, आज जब अतीत की सुनहरी यादें ताजा हो रही हैं तो जरूरी हो जाता है कि मैं "खुली किताब" हो जाऊं। दरअसल, जब मेरी सगाई की बात चल रही थी तो सीन में सिर्फ रजनी ही नहीं थी। दो और लड़कियां भी मेरे जीवन में प्रवेश करना चाहती थीं। हालांकि, मैंने तय कर लिया था कि शादी तो रजनी से ही करनी है। लेकिन, किसी लड़की को सीधे ना भी तो नहीं कहा जा सकता था।
पहली लड़की कोटद्वार-भाबर की ही रहने वाली थी। नाम तो अब याद नहीं रहा, पर वो पहाड़ के किसी राजकीय प्राथमिक विद्यालय में टीचर थी। गर्मियों की छुट्टियां पड़ रही थीं, इसलिए उसे कोटद्वार आना था। रिश्ते की बात आगे बढे़, इसके लिए उसने अपने घर वालों की अनुमति से मुझे संदेश भेजा था कि शाम पांच बजे के आसपास होटल "हाट एंड कोल्ड" में मिल जाना। मैं गया भी, लेकिन फिर अचानक मन में विचार आया कि, "छोड़ यार! क्या मिलना है। वैसे भी हमारी पटरी नहीं बैठने वाली। मैं खानाबदोश पत्रकार और वो सरकारी शिक्षक। दोनों ही घर में वक्त नहीं दे पाएंगे। किसी भी स्थिति में हमारी राह एक नहीं हो सकती। कमाई को लेकर भी। इसलिए बेहतर होगा कि अपनी राह लौट जाऊं।" इसके बाद मैं वापस लौट गया। वो आई या नहीं, मैंने पता करने की भी कोशिश नहीं की।

दूसरी लड़की के परिवार वालों से भी किसी करीबी ने ही बात चलाई थी। यह परिवार राजस्थान में रहता था और उन दिनों रिश्तेदारी में कोटद्वार आया हुआ था। लड़की राजस्थान में ही किसी अच्छे प्राइवेट स्कूल में टीचर थी और सरकारी नौकरी की तैयारी कर रही थी। मजा देखिए कि लड़की और उसके परिवार वाले, दोनों ही खुले मन से रिश्ते के लिए तैयार थे। पर, ईमानदारी से कहूं तो यहां भी मेरी दाल नहीं गलनी थी। इसलिए उनके आग्रह को मैं स्वीकार नहीं कर पाया। ऐसे में घर वाले तो चाहकर भी कुछ नहीं बोल सकते थे।

खैर! शादी की मुझे जल्दी नहीं थी और रजनी को भी नहीं। इसके कई कारण थे, जिन पर आगे रोशनी डालूंगा। हजारों किस्से हैं सुनाने के लिए, जिन्हें आहिस्ता-आहिस्ता आपकी नजर करूंगा। फिलहाल तो नींद के आगोश में जाने का वक्त हो गया है। मैं जानता हूं कि मेरे किस्सों को पढ़ने की चाह में आपको भी इतनी देर जागना पड़ता है, पर मितरों! इसमें न मेरा दोष है, न आपका ही। यह तो एक-दूसरे के प्रति हमारा स्नेह है। ये स्नेह यूं ही बना रहे। चलिए! अब सो जाते हैं। शुभ रात्रि।

इन्‍हें भी पढ़ें : 

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(Part - Three)

Engagement rasgullas and those two meetings
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Dinesh Kukreti
The engagement was done, but the friends were not even aware of it.  Yes!  The laddoos were definitely distributed in the neighborhood.  There was also information about kinship.  Bus!  Friends were left, which were yet to be told.  It had to start from the office itself.  Around ten o'clock I left home for the office.  Just fifty steps before the office, there is a sweet shop on the way, so I threatened to go straight there.  For two minutes he kept thinking about what to take, then took half a kilo of small rasgullas and started climbing the stairs of the office.
Our in-charge used to reach the office first.  So, I went straight to the in-charge's room and opened the box of rasgulla and put it in front.  At the same time politely said, "Brother! Take sweet your mouth."

With a smile on the face of the incharge, questions started floating.  Then he turned to me and said - "In what happiness Kukreti ji."

"Brother! In the joy of engagement" - I said.

The in-charge again asked anxiously - "Whose?"

"Yes brother! Mary" - I said.

On hearing this, the charge jumped as if a current of 440 volts was applied.  Then restraining himself he said - "But when?"

"Brother! Tomorrow"- I said.

"Tomorrow? But at what time? You haven't moved from here all day long," asked the in-charge.

Yes, I went straight to the girl's house in lunch time - "I said."

"What...? Wow! You agreed. When did we talk, when did we meet and when did we get engaged...no one even got air" - said the in-charge.

"That's it! Brother, it has become such a coincidence" - I said.

"Congratulations man! Many congratulations!"  - The incharge said while putting a rasgulla in his mouth.

By then other companions had also reached the office.  Everyone was looking at me with curious eyes.  Well!  Everyone sweetened their mouths and together demanded a feast.  I promised to sit soon.

Another important thing, which till date I have not told anyone.  I didn't even feel it necessary to share it with anyone.  But today, when the golden memories of the past are being refreshed, it is necessary that I become an "open book".  Actually, when the talk of my engagement was going on, it was not only Rajni in the scene.  Two more girls also wanted to enter my life.  However, I had decided that I have to marry Rajni only.  But, a girl could not be called straight either.

The first girl was a resident of Kotdwar-Bhabar.  Can't remember the name now, but she was a teacher in a government primary school in the mountain.  It was summer vacations, so he had to come to Kotdwar.  For the matter of the relationship to go ahead, for this he had sent me a message with the permission of his family members to meet him in the hotel "Hot and Cold" around 5 pm.  I went too, but then suddenly a thought came in my mind that, "Chod man! What to meet. Anyway, we will not be able to keep track of me. I am a nomadic journalist and that government teacher. Both will not be able to spend time at home. In any case.  Our path cannot be the same. Even with respect to earning. So it is better to go back to my path."  After that I went back.  I didn't even try to find out if she came or not.

Someone close to the other girl's family members also talked about it.  This family lived in Rajasthan and in those days had come to Kotdwar in relation.  The girl was a teacher in a good private school in Rajasthan itself and was preparing for a government job.  It is fun to see that both the girl and her family were ready for a relationship with an open mind.  But, to be honest, my pulse was not to be melted here too.  So I could not accept his request.  In such a situation, the people of the house could not say anything even if they wanted to.

Well!  I was in no hurry to get married and neither was Rajni.  There were several reasons for this, which I will shed light on later.  There are thousands of tales to narrate, which I will slowly look at you.  For now, it is time to go to sleep.  I know you have to stay awake for so long to read my stories, but friends!  It's neither my fault nor yours.  This is our love for each other.  May this love remain the same.  Let go!  Now go to sleep.  good night.

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